रवीश कुमार की अमरीका यात्रा : भाग 2

रवीश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और एनडीटीवी से जुड़े हैं. हाल ही में उन्होंने अमरीका की यात्रा की. अपनी इस यात्रा के दौरान उन्होंने वहां के येल यूनीवर्सिटी जैसे अकादमिक संस्थानों का गहराई से अध्ययन किया. साथ ही अमरीका में रह रहे ‘माइग्रेंट’ और वहां के रवासियों की जीवनशैली को भी कुछ नज़दीक से देखा. एक मझा हुआ पत्रकार यात्रा के दौरान एक देश और उसके लोगों को कैसे देखता है, उसकी एक बानगी उनकी यात्रा के दौरान लिखी गई इस डायरी से मिलती है. आप भी पढ़िए और देखिए अमरीका को रवीश के चश्मे से. पेश है उनकी दूसरा भाग. पहला भाग ये रहा.

कोलंबिया जर्नलिज़्म स्कूल का एक सफ़र

1912 में जब हम अपनी आज़ादी की लड़ाई की रूपरेखा बना रहे थे तब यहाँ न्यूयार्क में जोसेफ़ पुलित्ज़र कोलंबिया जर्नलिज़्म स्कूल की स्थापना कर रहे थे. सुखद संयोग है कि 1913 में गणेश शंकर विद्यार्थी कानपुर में प्रताप की स्थापना कर रहे थे. तो ज़्यादा दुखी न हो लेकिन यह संस्थान पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए दुनिया भर में जाना जाता है. मोहम्मद अली, शिलादित्य और सिमरन के मार्फ़त हमने दुनिया के इस बेहतरीन संस्थान को देखा. यहाँ भारतीय छात्र भी हैं और अगर ज़रा सा प्रयास करेंगे तो आपके लिए भी दरवाज़े खुल सकते हैं. किसी भी प्रकार का भय न पालें बल्कि बेहतर ख़्वाब देखें और मेहनत करें.

 

तो सबसे पहले हम इसके हॉल में घुसते हैं जहाँ 1913 से लेकर अब तक पढ़ने आए हर छात्रों के नाम है. मधु त्रेहन और बरखा दत्त यहाँ पढ़ चुकी हैं. और भी बहुत से भारतीय छात्रों के नाम है. पुलित्ज़र की प्रतिमा और उनका वो मशहूर बयान जिन्हें हर दौर में पढ़ा जाना चाहिए.

भारत में पत्रकारिता के दो से तीन अच्छे शिक्षकों को छोड़ दें तो किसी संस्थान में संस्थान के तौर पर कोई गंभीरता नहीं है. सवाल यहाँ संस्थान, संसाधन और विरासत की निरंतरता का है? मेरी बातों पर फ़ालतू भावुक न हो. यहाँ मैंने देखा कि पत्रकारिता से संबंधित कितने विविध विषयों पर पढ़ाया जा रहा है. प्रतिरोध की पत्रकारिता का पोस्टर आप देख सकते हैं. बचपन के शुरूआती दिनों की पत्रकारिता पर भी यहाँ संस्थान है. हिंसा क्षेत्रों में रिपोर्टिंग के दौरान कई पत्रकारों को मानसिक यातना हो जाती है. उन्हें यहाँ छात्रवृत्ति देकर बुलाया जाता है. उनका मनोवैज्ञैनिक उपचार भी कराया जाता है. यहाँ Dart centre for Journalism and Trauma है. खोजी पत्रकारिता के लिए अलग से सेंटर हैं. दुनिया के अलग अलग हिस्से से आए पत्रकार या अकादमिक लोग यहाँ प्रोफ़ेसर हैं. भारत के राजू नारीसेट्टी यहाँ पर प्रोफ़ेसर हैं. राजू ने ही मिंट अख़बार को स्थापित किया.

 

यह क्यों बताया? इसलिए बताया कि हमारे संस्थान गोशाला हो चुके हैं जहाँ एक ही नस्ल की गायें हैं. वहाँ न शिक्षकों में विविधता है न छात्रों में. और विषयों की विविधता क्या होगी आप समझ सकते हैं. IIMC के छात्र अपने यहाँ journalism of resistance का अलग से कोर्स शुरू करवा सकते हैं. यह नहीं हो सकता तो journalism of praising Modi शुरू करवा सकते हैं. यह भी एक विधा है और काफ़ी नौकरी है. लेकिन पहले जोसेफ़ पुलित्ज़र ने लोकतंत्र और पत्रकारिता के बारे में जो कहा है, वो कैसे ग़लत है, उस पर एक निबंध लिखें. फिर देखें कि क्या उनकी बातें सही हैं? कई बार दौर ऐसा आता है जब लोग बर्बादी पर गर्व करने लगते हैं. उस दौर का भी जश्न मना लेना चाहिए ताकि ख़ाक में मिल जाने का कोई अफ़सोस न रहे. वैसे भारत विश्व गुरु तो है ही!

इसके बाद अली ने हमें कुछ क्लास रूम दिखाए. एप्पल के विशालकाय कंप्यूटर लगे हैं. क्लास रूम की कुर्सियाँ अच्छा हैं. सेमिनार हॉल भी अच्छा है. झाँक कर देखा कि ब्राडकास्ट जर्नलिज़्म को लेकर अच्छे संसाधन हैं. यहाँ हमारी मुलाक़ात वाशिंगटन में काम कर रहे वाजिद से हुई. वाजिद पाकिस्तान से हैं. उन्होंने बताया कि जिस तरह मैं भारत में गोदी मीडिया का इस्तेमाल करता हूँ उसी तरह से पाकिस्तान में मोची मीडिया का इस्तेमाल होता है. यानी हुकूमत के जूते पॉलिश करने वाले पत्रकार या पत्रकारिता.

गुज़ारिश है कि आप सभी तस्वीरों को ग़ौर से देखे. सीखें और यहाँ आने का ख़्वाब देखें. हिन्दी पत्रकारिता में बेहतरीन छात्र आते हैं. वे यह समझें कि पत्रकारिता अध्ययन और प्रशिक्षण से भी समृद्ध होती है. भारत के घटिया संस्थानों ने उनके भीतर इस जिज्ञासा की हत्या कर दी है लेकिन फिर भी. मैंने उनके लिए यह पोस्ट लिखा है ताकि वे नई मंज़िलों की तरफ़ प्रस्थान कर सकें. अभी आपकी मंज़िल हिन्दू-मुस्लिम डिबेट की है. सत्यानाश की जय हो .

इंडिया में हर बंदा शार्टकट में लगा है

पाँच साल से टैक्सी चला रहे इन जनाब की यह बात उन सभी के लिए है जो शार्टकट में लगे हैं. न्यूयार्क में टैक्सी चलाने के अनुभव ने इस नौजवान को बदल दिया. पंजाब में अपने पिता की सरकारी नौकरी का इतना ख़ुमार था कि सामने का काम छोड़ कर शार्टकट में लगा था. मेहनत करने की नहीं सोचता था. यहाँ उसे यह बात समझ आ गई. इनकी टैक्सी दो शिफ़्ट में चलती है. शाम की शिफ़्ट में ख़ुद चलाते हैं. भारत की ख़बरों से दिलचस्पी ख़त्म हो गई है क्योंकि इन्हें लगता है कि सब बातों के काम में लगे हैं. केवल बात हो रही है.

 

न्यूयार्क की टैक्सी में ड्राइवर और यात्री के बीच बुलेटप्रूफ़ ग्लास लगा है. बताया कि कई बार लोग ड्राइवर पर पीछे से हमला कर देते हैं इसलिए बुलेटप्रूफ़ की सुरक्षा है. कंपनी से ही कार में बुलेटप्रूफ़ का शीशा लगा होता है. इस पर एक चेतावनी भी है कि ड्राइवर के साथ मारपीट करने पर पचीस साल तक की सज़ा हो सकती है. भारत में तो प्रधानमंत्री और बाहुबली ही बुलेटप्रूफ़ सुरक्षा में चलते हैं. कहानी छोटी है मगर काम की है. शार्टकट में लगना बंद कीजिए.

42 वें माले की छत और उस पर कांपता ठिठुरता एक लड़का

पहली बार 42 वें माले की इमारत की छत पर गया. जाने से पहले अंदाज़ा नहीं था कि ऊंचाई से नीचे देखने का साहस जुटा लूंगा. लिफ्ट का बटन दबते ही शरीर में सिहरनें दौड़ने लगीं. पता ही नहीं चला कि कब छत आ गई. वत्सल ने आराम से कहा कि जैकेट की ज़िप बंद कर लीजिए, बहुत ठंड है. ठिठक गया. मुझे नहीं पता था कि क्या दिखने वाला है. छत के अहाते में आते ही दीवार खोजने लगा. गिरने की आशंका के कारण ख़ुद को न गिरने देने का सहारा खोज लेना ठीक समझा. आगे बढ़कर रेलिंग तक जाने की हिम्मत नहीं हुई. सहमा रहा और न्यूयार्क को देखने लगा. एक पल में खूबसूरत एक पल में भयावह. पेंसिल की नोंक की तरह इमारतें आसमान में खड़ी थीं. इंसान वाकई दुस्साहसी है.

 

जिस इमारत को नीचे से गर्दन टेढ़ी करने पर भी पूरी तरह नहीं देख सका, उसकी छत पर होना किसी सदमे से कम नहीं था. हड्सन नदी के उस पार की इमारतें या फिर दूसरी तरफ दूर खड़ी इमारतें. नीचे झांकना आसान नहीं था. लगा कि इंसान कितना छोटा है. बड़ा है तो उसका बनाया हुआ मकान. हम मकानों के बने पहाड़ों के शिखर पर चीटीं की तरह ठिठके थे. नीचे गाड़ियां पिल्लुओं की तरह सरक रही थीं.

 

नज़रों के बीच फैसला नहीं हो पाया कि जो देख रहे हैं वो ख़ूबसूरत है या भयावह. दूर किसी छोर पर इमारतें पेंसिल के नोंक की तरह खड़ी थीं. एक दूसरे से सटी सटी. न्यूयार्क में इमारतों का सुरंग है. कम से कम जगह में ऊंची से ऊंची इमारतें बनते-बनते सुरंग बन गई है. हर सुरंग से हवा आंधियों की तरह उड़ाती आती है. हर वक्त सर पर इमारतें हावी रहती हैं. लगता है इंसान ने इमारतों का बिल बनाया है और उसमें से चूहे की तरह एक इमारत से निकल कर दूसरी इमारत में घुसता जा रहा है.

 

रोमाचंक था. डर भी लगा. रह-रहकर ऊंचाई का भय अंदर कांप जाता है. ऊंचाई कई लोगों को पसंद है. वे पचास माले पर मकान या दफ्तर खरीद लेते हैं. तभी तो सौ माले से ऊंची इमारतें बनी हैं. धरती पर इमारतें बजा बजा आईं हैं. पूंजी ने इस शहर को ऊंचाई दी है. कभी इमारतें बजबजाती लगती हैं. कभी इमारतें चमचमाती लगती हैं. यही सीख कर उतरा कि ऊंचा नहीं होना है. सीढ़ी दिखे तो चुपचाप उतर जाना है. उनके बीच विलीन हो जाना है जो ऊपर से देखते हुए कीड़े मकोड़े लग रहे थे. वहां क्या रहना जहां चील-बाज़ भी नहीं उड़ते हैं. जहाज़ तो ऐसे लगा कि खिड़की के बगल से जा रहा हो और यात्री हाथ निकालकर बालकनी में बैठे किसी अल्बर्ट साहब से चाय के लिए चीनी न मांग दे. बार-बार कान पकड़ते रहे कि अब दोबारा नहीं. वापसी में जहाज़ में सोते हुए अचानक जाग गया कि उसी छत पर अब भी हूं. घर पहुंच कर सोते हुए कई बार लगा कि उसी छत पर अब भी हूं. जिन्हें ऊंचाई पसंद है ईश्वर उन्हें दो सौ माले का मकान दे दे. मुझे इकतल्ला चलेगा. हम इसी में खुश रहेंगे.

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