रानीखेत : एक जगह जो एक साथ प्रेमी और वैरागी बना देती है-2

लतिका जोशी पत्रकार हैं. उत्तराखंड से हैं. कहानियां और कविताएं भी लिखती हैं. आज पेश है रानीखेत और उसके आस-पास के इलाके में की गई उनकी पारिवारिक यात्रा के क़िस्सों का दूसरा  हिस्सा. पहला हिस्सा आप यहां पढ़ सकते हैं. 

कहा जाता है कि यहां एक बार कुमाऊं की रानी पद्मिनी घूमने आई और ये जगह उनके दिल में बस गई। राजा ने उनके लिए यहीं एक महल बना दिया और इस जगह को रानीखेत नाम दे दिया। हालांकि वो महल कहां बना था, ये किसी को नहीं पता। पर ये जगह काफी है इस कहानी पर विश्वास कर लेने के लिए।

 हमारी मुलाकात एक दोस्त से होती है। हरियाणा के रहने वाले हैं लेकिन यहां सिपाही हैं। बताते हैं, पिछली बार होली पर घर गए थे। मैंने पूछा परिवार की याद आती है, तो बोले…बहुत आती है। मैंने पूछा अभी छुट्टी मिलेगी तो जाएंगे? कहते हैं नहीं…अभी नहीं जा सकता। मैंने पूछा क्यों? तो जवाब आता है…मेरी बेटी एक बार आई थी यहां, तब से बुरांस के फूलों की दीवानी हो गई है। तो जब मार्च-अप्रैल में बुरांस खिलेगा तो ले जाऊंगा उसके लिए। खाली हाथ गया तो घर में घुसने नहीं देगी। मैं प्रसून की ओर देखती हूं, वो मुस्कुरा देता है। हमें एक-दूसरे की आंखों में एक कहानी दिख जाती है। एक कहानी जिसकी रानी मैं थी, जिसका राजा वो था। एक कहानी जिसमें एक रानी कौसानी जाती है और बुरांस का फूल किसी तरह पानी भरी बोतल में ताज़ा रखके लाती है राजा के लिए, और कहती है…हां प्यार है मुझे…

सोचती हूं कि हम सब अपनी-अपनी लाइफ में किसी न किसी के लिए एक न एक बार वो ‘राजा’ जरूर बनते हैं, जो अपनी ‘रानी’ के लिए इतिहास रचता है। ऐसा इतिहास जिसे दुनिया पागलपन कहती है और हम मुहब्बत कहते हैं। सारी कहानियां कहां ज़माना याद रखता है। हम याद रखें, ये काफी है। 

मैंने प्रसून से कुछ शरारती लेकिन राजसी अंदाज़ में कहा, अगर हमें कोई जगह पसंद आए तो, महाराज आप उसे क्या नाम देंगे?  उसने कतई अनरोमांटिक लेकिन शाही अंदाज़ में कहा, महारानी मोजे ले लेते हैं, ठंड से बचेंगे तो जरूर कोई नाम सोचेंगे।

मैं पहले भी बता चुकी हूं कि दिसंबर का महीना था तो सिर्फ ठंड थी, ये बताना बेईमानी होगी। तो ये जो इस समय हमें अपने पैरों में मोजे पहनने के बाद भी  जकड़न सी महसूस हो रही थी, ये ठंड से कहीं ऊपर की चीज़ थी। रानीखेत की मार्केट उतनी ही छोटी सी है, जितनी हर छोटी पहाड़ी जगह की होती है। ख़ैर हमने 2-2 जोड़ी एक्स्ट्रा मोजे लिए और फिर हम पहुंचे मेहरा मोमोज़ खाने। इस मार्केट की बड़ी मशहूर लेकिन छोटी सी एक दुकान, जिस पर मोमो मिलते हैं। मेहरा जी ने प्लेट भर भाप उगलते गर्म मोमोज़ हरी चटनी के साथ हमें परोस दिए। मैंने इन मोमोज़ से पहले अपने हाथ गर्म किए, फिर जीभ, फिर गला और फिर पेट।

इसके बाद हम चल पड़े गोल्फ मैदान की ओर। अगर आप 90 के दशक की वो बॉलिवुड फिल्में देखकर बड़े हुए हैं, जहां एक्ट्रेसेज़ शिफॉन की साड़ी पहनकर देवदार के पेड़ों के बीच अपने हीरो के साथ छुपनछुपाई खेलते हुए या डांस करते हुए दिखती थीं, तो ये जगह आपको ऐसा ही करने के लिए उकसा सकती है। हां मतलब गोल्फ मैदान है, तो इसका असल उद्देश्य गोल्फ खेलना ही है लेकिन मेरे जैसे फिल्मों के शिकार लोग वहां पहुंच जाएं, तो हमारे मन में यही ख़याल सबसे पहले आता है। 

गोल्फ खेलने के शौकीन हैं, फिर तो ये जगह आपका इंतज़ार ही कर रही है। एक छोटी सी कैंटीन है यहां पर, आप चाहें तो गरमा गरम कॉफी के साथ इन नज़ारों को गटक सकते हैं। शाम के 7 बज चुके थे। हमें कुमाऊं रेज़ीमेंटल म्यूज़ियम में भी जाना था लेकिन वो 5 बजे बंद हो चुका था। सो अगले दिन की टु डू लिस्ट में एक और नाम जुड़ चुका था।

हमें उन्ही साथी ने बताया कि अब हमें सीधे अपने होटल चले जाना चाहिए, क्योंकि शाम को कई बार लोगों ने बाघ और तेंदुए को देखा है इन जंगलों में। हम कार में बैठे और चल दिए अपने होटल की ओर। डिनर किया और फिर बिस्तर पर ऐसे गिर गए जैसे किसी ने गोली मार दी हो हमें। इतनी गहरी नींद मुझे दिल्ली में कभी भी नहीं आई थी। अगली सुबह 5.30 बजे उठे और तैयार होकर चल दिए छोटी सी ट्रैकिंग के लिए। बड़ी अज़ीब बात थी लेकिन उस समय इतनी ठंड नहीं लगी जितनी हम तैयारी करके आए थे। शायद इसलिए क्योंकि पैदल चल रहे थे। 

मुझे अपना बढ़ता वजन इतना कभी नहीं खला जितना ट्रैकिंग करते हुए भारी पड़ रहा था। मेरी धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि मुझे उनकी आवाज़ सुनाई दे रही थी। मुंह से भाप निकल रही थी। हाथ में लाठी थी मेरे। सोचा तो था कि अगर तेंदुआ मिला तो उससे लड़ूंगी पर उसकी अच्छी किस्मत! नहीं मिला। मैंने दोस्त से पूछा, आपको जंगली जानवरों से डर नहीं लगता? तो उसने मुस्कुराते हुए हरियाणवी लहज़े में मेरी लाठी की ओर देखकर कहा, ‘अरे डरने की क्या बात है जी, वो इंसान थोड़े ही हैं।‘ फिर मैंने डंडा फेंक दिया।

मैंने उससे फिर पूछा, ‘अच्छा अगर अचानक अभी तेंदुआ दिख गया, तो क्या करेंगे?’ उसने फिर पंच मारा, ‘उसे सम्मान दें और जाने दें।‘ मैंने फनी बनने की कोशिश करते हुए कहा, ‘वो चला जाएगा तो खाएगा क्या?’ उसने एक और पंच मारा, ‘ये दिल्ली नहीं है दोस्त, जंगल है, तेंदुआ क्या यहां हर जानवर इस काबिल है कि वो अपने टाइप का खाना जंगल से खुद खोज लेता है। आपको शक तो नहीं उनकी काबिलियत पर?‘ मैंने ना में सिर हिलाया और फिर एक शब्द न कहा। 

मैं पूरी ट्रैकिंग भर एक ही सवाल कर रही थी…अब और कितना चलना है? प्रसून हंस कर जवाब देते, बस दो कदम और…। आखिरकार ये ट्रैकिंग एक रिजॉर्ट पर जाकर रुकी। रिजॉर्ट ऐसी ऊंचाई पर कि बस…सारी मेहनत सफल हो गई। हिमालयन रेंज जैसे कुछ और पास आ गई हो। जैसे वो कह रही हो, थोड़ा तुम चल लो… थोड़ा मैं आ रही हूं तुम्हारे पास। जल्द मिलते हैं। हमने बढ़िया सी चाय टोस्ट के साथ गटकी। तस्वीरें खिंचाईं। सुबह के 8 बज रहे थे। इतनी वैलकमिंग सुबह पिछली बार कब मुझसे मिली थी, मुझे याद नहीं। ये सच में ‘गुडमॉर्निंग’ थी।

तो अब फिर समय आ चुका था, उसी ट्रैक पर वापस चलकर उसी जगह पहुंचने का, जहां से आए थे। 

मैं जब भी पहाड़ो में जाती हूं मुझे लगता है जैसे हर जगह मेरा हाथ थाम के बैठी है। जैसे कोई स्कूलफ्रेंड मिल गई हो जो कब से इंतज़ार कर रही थी। जैसे उसे इतने सालों बाद मुझे देखने पर समझ ही नहीं आ रहा कि मुझसे गले मिले कि मेरा हाल पूछे। मैं उसे देखकर कहती हूं, कितना बदल गई है तू, वो कहती है…खुद को देखा है? और फिर हाथ छूटते हुए लगता है कि बस एक नज़र भर देख लूं उसे…फिर जाने कब मिलेगी।

यहां ठंड नहीं थी, पैदल चलते-चलते मेरा चेहरा लाल हो गया था। जैकेट अब कमर पर बांध ली थी और स्वेटर मेरा गला घोंट रहा था। गला सूख रहा था। उधर प्रसून ऐसे चल रहे थे, जैसे रोज इसी रास्ते ऑफिस जाते हों। और फौजी साथी तो बता ही चुके थे कि ट्रेनिंग के दौरान उन्हें हर रोज इसी ट्रैक पर दौड़ना होता था। तुम पहाड़ी ही हो ना? प्रसून ने मेरी हालत देखकर तंज मारा। ‘पहाड़ी पैदल चलने की स्पीड से नहीं आंके जाते सर, चलने के हौसले से आंके जाते हैं।’ फिर हमारे तेजतर्रार साथी ने जोरदार पंच मारा था। हम सब हंस दिए। उस जंगल में हमारी हंसी के अलावा इस दौरान एक और आवाज़ आई। वहां कुछ है… देवदार के झुंड की ओर इशारा करते हुए मैंने कहा। मुझे लगा जैसे कोई वहां से तेज रफ्तार से निकला है। ‘नीलगाय होगी, घबराइए नहीं,’ उस साथी ने कहा और हंस दिया। इस बार उसकी हंसी में…’हाउ सिली’ था। 

होटल वापस पहुंचते हुए 10.30 बज चुके थे। चले बहुत थे, लेकिन थकान नहीं महसूस हो रही थी। हमने आलू के पराठे, आलू की ही सब्जी और रायते के साथ उड़ाए और चल दिए और 12 बजे के करीब चौबटिया की तरफ। पहाड़ों में आलू खूब खाए जाते हैं। आलू के पराठे, आलू की सब्जी, आलू का झोल, आलू के पकौड़े….सर्वस्व आलू

हां तो चौबटिया यानी चार बाट। बाट यानी रास्ते। यानी चौराहा। रानीखेत से 10 किलोमीटर की दूरी पर है चौबटिया। वैसे रानीखेत पूरा अंग्रेज़ों ने बसाया हुआ है। भले ही वो छावनी हो या ये चौबटिया गार्डन। आपको जानकर खुशी होगी कि चौबटिया एशिया का सबसे बड़ा फलों का बगीचा माना जाता है। यहां सेब की ही करीब 35-40 किस्में हैं। लेकिन हमें ये सब देखने का सौभाग्य नहीं मिला। वजह थी दिसंबर। दिसंबर में यहां आपको बस सेब के पेड़ों की सूखी टहनियां देखने को मिलेंगी जो कि फरवरी-मार्च आते-आते हरी-भरी हो जाती हैं। तो माह-ए-दिसंबर में हमारे देखने के लिए वहां कई छोटी-छोटी क्यारियां थीं और सीढ़ीदार सूखे खेत थे, जिन्हें फरवरी में हरा होना था। लेकिन इसके बावजूद इस जगह ने निराश नहीं किया। क्या तो शानदार व्यू था वहां का। बैठो तो सामने से विस्तृत हिमालय, नंदादेवी, त्रिशूल और नीलकंठ की पर्वत चोटियां बांध लेती हैं अपनी चमक से।

चौबटिया गार्डन में प्रवेश करते समय अच्छा ये होता है कि एक गाइड कर लें। वे आपको हर पेड़ के बारे में विस्तार से बताएंगे। यहां आपको कई किस्मों के पेड़ दिखेंगे, कई औषधियों की पौध दिखेंगी। साथ ही आपको बुरांस, खुमानी, लीची, पहाड़ी नींबू का जूस भी मिल जाएगा। आप चाहे तो पी लें चाहे ले जाएं अपने साथ सुरक्षित। 

चौबटिया से निकलकर हम झूलादेवी मंदिर गए। आप भगवान पर भरोसा करते हों न करते हों, यहां बांधी गई हज़ारों-लाखों घंटियों को देखेंगे तो आपको लोगों की आस्था पर भरोसा जरूर हो जाएगा। यहां लोग दूर-दूर से मन्नतें लेकर आते हैं और मन्नतें पूरी हो जाने पर अपनी तरफ से एक घंटी चढ़ाकर जाते हैं। जितने लोग, उतनी ही ख्वाहिशें, उतनी ही घंटियां। कौन जाने झूलादेवी ने कितनी मन्नतें पूरी की होंगी, कौन जाने कितनी ख्वाहिशें अधूरी होंगी, कौन जाने कितने लोगों ने वापस आकर घंटी चढ़ाई होगी…लेकिन एक बात तय थी…ये जगह किसी को निराश नहीं कर सकती। मानसिक शांति देती है ये जगह। कुछ तो बात है यहां। हां ये वो लड़की कह रही है जो मंदिरों में सिर्फ मूर्तियों और दीवारों की कलाकृतियों को देखने जाती है।

मंदिर से निकली तो देखा 4 बज चुके हैं। एक घंटा बचा था म्यूजियम बंद होने में। चाय पीने का बहुत मन था लेकिन हम कुमाऊं रेज़ीमेंट के म्यूज़ियम की ओर बढ़ चले। मुझे यूं म्यूज़ियम बड़े बोरिंग लगते हैं लेकिन यहां की बात और थी। आप जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, वैसे-वैसे आपको अपने देश पर, अपने देश की सेना पर और भी गर्व होने लगता है। 1 घंटे बाद म्यूज़ियम बंद होने की घोषणा हुई। लोग धीरे-धीरे बाहर निकल रहे थे। हम बाहर निकले तो ड्राइवर ने कहा वो हमें बढ़िया सी चाय पिलाने ले चलेगा। रास्ते में उसने हमें रानी झील दिखाई। ये झील कृत्रिम थी और छावनी ही इसकी देखभाल करती थी।

ये शाम जो हमें इस होटल में मिली थी, ये शाम भुलाने के लिए कुदरत को मुझे कुछ और नज़ारे दिखाने होंगे। कितनी शांत, कितनी सादी लेकिन कितनी ख़ास। हमने पकौड़े और चाय ऑर्डर की। देर तक बैठे बातें करते रहे। चाय का असली रस बातों के साथ घुलकर आता है। मैं कह रही थी कि चौबटिया को फला-फूला देखने के लिए मैं मार्च में भी आऊंगी। प्रसून मज़ाक कर रहे थे कि तुम मार्च तक यहीं रुको, फलते-फूलते भी देख लेना अपनी आंखों से। हां मैं यही तो करना चाहती थी। मैं इस शाम को यहीं रोककर अपनी बगल की कुर्सी पर बैठा लेना चाहती थी पर हाए 8 बज चुके थे। निकलने का समय हो गया था। 

अगली सुबह हमें मुनस्यारी के लिए निकलना था। भीमताल मुझे याद था, उससे किया हुआ वादा भी लेकिन बिरथी फॉल का आकर्षण मुझसे छूट ही नही रहा था। काश कि मैं आपको ले चलती आगे भी पर ये शब्द सीमा साथ नहीं दे रही। मैंने कहा था न, मुझे समझ नहीं आता कि क्या-क्या बताऊं और क्या-क्या छोड़ दूं।

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लतिका जोशी

लतिका जोशी पत्रकार हैं. उत्तराखंड से हैं. कहानियां और कविताएं भी लिखती हैं. घुमक्कड़ी की शौकीन हैं और घूमे हुए को शब्दों में ढालने में भी यकीन रखती हैं.

2 thoughts on “रानीखेत : एक जगह जो एक साथ प्रेमी और वैरागी बना देती है-2

  • November 13, 2018 at 2:39 pm
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    आपकी लेखनी में जादू है, मंत्रमुग्ध होकर अगले भाग का इंतजार है

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  • November 17, 2018 at 12:23 am
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    यात्राएं खूबसूरत हुआ करती है, और ऐसे संस्मरण उनमें रंग भर देते हैं।

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