पिंडारी ग्लेशियर जाना है? ये रहा तरीक़ा

केशव भट्ट :

पिंडर घाटी क्षेत्र में पिंडारी ग्लेशियर के अलावा, कफनी तथा मैकतोली आदि ग्लेशियर हैं। बागेश्वर से इन क्षेत्रों में जाने के लिए पिंडारी ग्लेशियर पैदल मार्ग में अंतिम गाँव खाती तक तीन मार्ग हैं। खाती गाँव से इन ग्लेशियरों को जाने के लिए रास्ते अलग हो जाते हैं। इस मार्ग में अभी केवल पिंडारी ग्लेशियर के पहले पड़ाव फुर्किया तक रहने के लिए टीआरसी तथा पीडब्लूडी के रेस्ट हाउस हैं। वैसे स्थानीय लोगों की दुकानों में भी इमरजेंसी में रहने की व्यवस्था हो जाती है। इसके लिए आप पहले से ही इन रेस्ट हाउसों की बुकिंग करवा सकते हैं। केएमवीएन की वैब साईड में जाकर ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा है। इसके साथ ही कुछ टूर आपरेटर भी हैं। वैसे पिंडर घाटी क्षेत्र के कई लोग पर्यटन के साथ ही हाई एल्टी ट्रैकिंग तथा पीक क्लाईबिंग में भी अच्छे अनुभवी हैं। वे भी इस क्षेत्र से जुड़े हैं।

इस टैकिंग यात्रा में कुछ जरूरी सामानों की आप लिस्ट बना लें। टाॅर्च, छाता, दो जोड़ी जुराब, टायलट किट, एक विंड प्रूफ जैकेट, चश्मा, वाटर बोटल, रुमाल, कैप, फस्ट एड किट, माचिस/लाईटर, स्लीपर, कुछ खटटी-मीठी टाॅफी, कुछ चाॅकलेट व बिस्कुट। बाकी आप अपने पहनावे का सामान अपनी इच्छा से रख सकते हैं। ज्यादा कपड़े ना ही रखें तो आपके लिए ठीक रहेगा। जब आप ट्रैकिंग कर रहे होते हैं तो मौसम ठीक रहने पर शरीर में गर्मी रहती है। उस वक्त हाफ टी शर्ट व टाउजर से काम चल जाता है। अपने पड़ाव में पहुँचते ही शरीर के कपड़े ना उतारें, बल्कि विंड पू्रफ जैकेट पहन लें। ऊँचाई में शरीर में पानी की मात्रा कम होने पर सिर दर्द की शिकायत पहले दो दिनों में अकसर रहती है, उससे घबराएं नहीं। इसके लिए पानी, सूप, जूस, चाय आदि लेते रहें। दवाईयों से परहेज करें तो अच्छा रहेगा।

पहले आपको बताते हैं, मुख्य पैदल यात्रा मार्ग के बारे में। बागेश्वर से भराड़ी होते हुए सौंग तक जीपें जाती हैं। ये दूरी 36 किलोमीटर की है। सौंग से आगे कच्ची सड़क है, जो अकसर बरसातों में टूटने की वजह से कई महीनों तक बंद पड़ी रहती है। सौंग से दो सड़कें हैं। एक सड़क दाहिने को जाती है जो मोनार होते हुए सूपी, पतियासार गाँव तक बनी है और दूसरी बाँई ओर चढ़ाई को जाती है लोहारखेत, खलीधार, रगड़, चैड़ास्थल, पेठी, कर्मी, विनायक धार, धूर, खर्किया तक।

सड़क द्वारा सौंग से लोहारखेत पाँच किलोमीटर की दूरी पर है। यहाँ से किलोमीटर भर आगे खलीधार में कुमाऊँ मंडल विकास निगम का रेस्ट हाउस है। इससे पहले सूडिंग गाँव में पीडब्लूडी का एक खंडहर बंगला है, जहाँ रुकने की व्यवस्था नहीं है। सौंग से जीप वाले यहाँ तक बुकिंग करवाने पर दो-तीन सौ रुपये में छोड़ देते हैं। वैसे ये पैदल रास्ता करीब तीनेक किलोमीटर का है। अगर आप बाहरी क्षेत्र से आ रहे हैं तो बागेश्वर या अन्य जगहों से दोपहर में पहुँचे हैं तो बागेश्वर में रुकने के बजाय खलीधार में रात गुजारने के लिए बढ़िया है। सुबह यहाँ से पैदल चलने में अच्छा रहता है और समय भी बच जाता है।

आप यदि अपनी गाड़ी लाए हैं और वो एसयूबी नहीं है तो उसे सौंग में ही छोड़ना ठीक रहेगा। आगे की सड़क कच्ची और उबड़-खाबड़ वाली है। इसमें गाड़ी चलाना बाहर से आने वालों के लिए खतरनाक है। सौंग में कुछ दुकानदार वहीं रहते हैं जिनकी सुरक्षा में गाड़ी छोड़ी जा सकती है। वैसे यदि आपको अपनी गाड़ी की चिंता फिर भी सता रही है तो बागेश्वर में सिद्वार्थ होटल के साथ ही कुछ होटलों में पार्किंग की व्यवस्था है। आप वहाँ नाईट स्टे कर वहीं अपनी गाड़ी छोड़ सकते हैं। दूसरे दिन यहीं से आपको भराड़ी-सौंग के लिए जीप मिल जाएगी। सिद्धार्थ होटल बस स्टेशन में ही है। यहाँ खाती गाँव समेत ऊपरी क्षेत्र के लोग आते रहते हैं, जिनमें से ज्यादातर गाईड, पोटर भी होते हैं। उनसे आपको काफी मदद मिल जाएगी। इसके लिए होटल के काउण्टर में इस बारे में इंक्वारी कर लें।

लोहारखेत से करीब आधा किलोमीटर हल्की मीठी चढ़ाई के बाद आगे को जा रही कच्ची सड़क में चलना होता है। लोहारखेत से धाकुड़ी की पैदल दूरी लगभग नौ किलोमीटर है। समय करीब पाँच घंटे मान कर चलिए। चलने से पहले अपनी वॉटर बोटल में पानी जरूर भर लें। हालाँकि पानी इस रास्ते में कई जगहों पर मिलते रहेगा लेकिन स्वयं के पास पानी होना बहुत जरूरी है। इस पैदल रास्ते में दोनों ओर सैकड़ों की तादात में बुराँश के पेड़ हैं। फरवरी से अप्रेल तक इस रास्ते में बुराँश के फूल बिछे रहते हैं। आप यदि खामोशी से चलें तो अपनी दुनिया में मगन कई पक्षियों की सुरीली आवाजों का आनंद भी ले सकते हैं। करीब डेढ़ किलोमीटर बाद ये कच्ची सड़क बाँई ओर चैड़ास्थल गाँव की ओर को मुड़ जाती है। इस जगह का नाम रगड़ है। यहाँ से दाहिने को पैदल रास्ते में चलते चले जाना हुआ। आपको हल्की चढ़ाई लिए हुए घना जंगल मिलेगा जिसकी छाँव में चलने का आनन्द आपको वहीं मिलेगा। रास्ते में अंग्रेजों के जमाने के बने लकड़ी के पुल भी मिलेंगे। हालाँकि कुछ पुलों की हालत खराब होने पर बमुश्किल उन्हें कई वर्षों बाद सुधारा गया है। पैदल रास्ता धीरे-धीरे पहाड़ के साथ अंदर तक ले जाते हुए दाहिनी ओर मुड़ेगा। एक पथरीली चढ़ाई के बाद मिलेगा झंडी धार। यहाँ कुछ देर आप अपनी सांसों को आराम दे सकते हैं। यहाँ एक खूबसूरत मंदिर बुराँश से घिरा हुआ है। पहले यहाँ एक बुजुर्ग परिवार चाय-नाश्ते की दुकान चलाते थे। धीरे-धीरे आवाजाही कम होने पर वो भी इस जगह को छोड़कर चले गए। अब यहाँ सिर्फ दुकान के खंडहर ही उनकी याद दिलाते हैं।

यहाँ से आगे कुछ दूरी पर है तल्ला धाकुड़ी। पर्यटन सीजन में यहाँ एक दुकान खूब चलती है। यदि आप सुबह बिना नाश्ते किए चले हैं तो यहाँ आपको हल्का नाश्ता मिल जाएगा। यहाँ पानी के धारे में मीठा पानी भी हर पल सबकी प्यास बुझाते रहता है। यहाँ से आगे का रास्ता थोड़ी सी चढ़ाई लिए हुए है। कुछ जगहों पर शाॅर्टकट रास्ते भी हैं, लेकिन यदि आप पहली बार जा रहे हैं तो मुख्य रास्ते को ना छोडं़े। आगे धीरे-धीरे बुग्याली घास के मैदान आपकी थकान मिटाते चले जाएंगे। कुछ किलोमीटर मीठी चढ़ाई के बाद एक बुग्याली घास का तिरछा मैदान आपको मिलेगा। इस जगह पर जर्मनी के पीटर कोस्ट की याद में एक समाधी है। 56 वर्षीय पीटर तीन जून 2000 को पिंडारी से अपने साथियों के साथ वापस लौट रहे थे तो हृदय गति रुक जाने से उनका देहान्त हो गया।

यहाँ से अब हल्की चढ़ाई के बाद रास्ता आपको धाकुड़ी के शीर्ष में ले जाएगा। स्थानीय लोग इस जगह को चिल्ठा विनायक धार भी कहते हैं। यहाँ पहुँचते ही सामने हिमालय को देख आपकी थकान दूर हो जाएगी। यहाँ से अब धाकुड़ी को एक किलोमीटर का ढलान है। यहँ से दाँए-बाँए ऊँचाई पर बने पुराने दो मंदिरों के लिए दो रास्ते हैं। बाँई ओर करीब एक किलोमीटर की दूरी पर कर्मी गाँव के शीर्श में बने मंदिर को कर्मी चिल्ठा मंदिर तथा दाहिने ओर करीब दो किलोमीटर की दूरी पर सूपी गाँव के शीर्ष में बने मंदिर को सूपी चिल्ठा मंदिर के नाम से जाना जाता है। यहाँ के लोगों के मुताबिक सूपी चिल्ठा मंदिर पहले बना है। इस मंदिर की बनावट को देखकर ऐसा लगता भी है। कर्मी चिल्ठा मंदिर को जाते हुए एक खूबसूरत बुग्याल मिलता है। वक्त हो और धाकुड़ी में यदि दो दिन बिताने हों तो इस बुग्याल और मंदिर का दीदार करना ना भूलें। अकसर पिंडारी या अन्य ग्लेशियरों से वापसी में ज्यादातर प्रकृति प्रेमी यहाँ जाना पसंद करते हैं। कुछ तो अपने टैंट के साथ यही पसर जाते हैं। यहाँ से गढ़वाल से लेकर नेपाल तक फैले हिमालय की खूबसूरत रेंज दिखती है।

धाकुड़ी लगभग 2550 मीटर की ऊँचाई पर है। यहाँ कुमाऊँ मंडल विकास निगम के साथ ही पीडब्लूडी के रेस्ट हाउस हैं। कुछ दुकानें भी हैं, जिनमें भीड़ होने की स्थिति में रहने की व्यवस्था भी हो जाती है। धाकुड़ी में अभी फाइबर हट बने हैं लेकिन इनका काम पूरा नहीं हुआ है। आपके पास यदि टैंट है तो यहाँ मैदान में लगाने कीे बेहतर जगह है। धाकुड़ी में मौसम प्रायः ठंडा रहता है। अकसर दिसंबर अंत से फरवरी-मार्च तक धाकुड़ी व चिल्ठा टाॅप बर्फ से लकदक रहते हैं। अप्रेल से जून के मध्य तथा सितंबर से दिसंबर तक का मौसम काफी सुहावना रहता है। यहाँ पीडब्लूडी के बंगले में तैनात हयात सिंह काफी मिलनसार व हँसमुख हैं। धाकुड़ी में अंग्रेजों के जमाने के बने डाक बंगले बेहतर तकनीक से बने हैं। बाहर खुला हरा-भरा आंगन और अंदर एक बरामदा है। ठंड में कमरे में बने फायर प्लेस में जलती आग कमरे में अच्छी गर्माहट भर देती है। सूर्योदय और सूर्यास्त के वक्त धाकुड़ी के सामने मैक्तोली, नंदा कोट समेत हिमालय की घाटियों में सूरज की लाल रक्तिम किरणों से जो अद्भुत नजारा दिखता है, उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

धाकुड़ी इस साहसिक पैदल यात्रा का पहला पड़ाव है। धाकुड़ी से सुबह निकलना बेहतर रहता है। अब ज्यादातर ट्रेकर लोहारखेत से धाकुड़ी होते हुए एक ही दिन में खाती गाँव पहुँचने का लक्ष्य रखते हैं। पिंडारी या अन्य ग्लेशियर से वापसी में वो धाकुड़ी रुकना पसंद करते हैं, ताकि चिल्ठा टाॅप भी हो लें। आज आपको पिंडारी ग्लेशियर मार्ग में अगला पड़ाव द्वाली तक ले चलेंगे। कुल पैदल दूरी लगभग 19 किलोमीटर। यात्रा से पहले अपनी वॉटर बोटल में पानी भरना ना भूलें।

लगभग 1982 मीटर की ऊँचाई पर बसा खाती गाँव यहाँ से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर है। धाकुड़ी से खर्किया तक तीनेक किलोमीटर का ढलान है। फरवरी से अप्रेल माह तक इस रास्ते के दोनों ओर बुराँश की लालिमा छिटकी मिलती है। करीब डेढ़़ किलोमीटर के बाद रास्ते के किनारे वन विभाग द्वारा बनाया गया हर्बल गार्डन है। वन विभाग ने 2008 में इसे जड़ी-बूटी के साथ ही पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाया था। लेकिन इस हर्बल गार्डन की हालत देख ऐसा कुछ नहीं लगता। गार्डन में थाम रिंगाल, तेज पत्ता, थुनेर-टेक्सास बकाटा, अतीस, जटामासी, कुटकी, सालम मिश्री की पौंध भी लगाई गई लेकिन प्रयास सफल नहीं हो सका। कुछ कदमों के बाद जंगल खत्म होते ही बाँई ओर दूर तक फैले पहाड़ों की गोद में बसे बधियाकोट से लेकर वाच्छम तक दर्जनों गाँवों की झलक दिखती है।

थोड़ा आगे भगदाणु नामक जगह है। भगदाणु लगभग दस-पन्द्रह मवासों का रास्ते के दोनों ओर फैला हुआ छोटा सा गाँव है। करीब किलोमीटर भर उतार के बाद मिलता है खर्किया। पहले के और आज के खर्किया में बहुत अंतर आ गया है। अब यहाँ पर पर्यटकों के रुकने के लिए ‘प्रिन्स’ नामक रेस्ट हाउस भी बन गया है। यहाँ तक कर्मी होते हुए कच्ची सड़क भी पहुँच गई है। हालाँकि सड़क के हालत बहुत सही नहीं हैं लेकिन जीपों में सामान के साथ सवारियाँ भी किसी तरह यहाँ तक पहुँच ही जाती हैं। खर्किया से एक रास्ता सीधे नीचे उतार में पिंडर नदी को पार कर ऊँचाई में बसे वाच्छम गाँव को जाता है। दूसरा रास्ता दाहिने को हल्के उतार के बाद हल्की चढ़ाई लिए हुए उमुला, जैकुनी, दउ होते हुए खाती गाँव को है। अब जैकुनी व दउ में भी पर्यटकों के रहने के लिए स्थानीय लोगों ने अपने रेस्ट हाउस भी बना लिए हैं। रास्ते में घने पेड़-झाड़ियों के झुरमुटों के मध्य बने गधेरों से कल-कल बहता पानी हर किसी के मन को खींचता है।

खाती से आधा किलोमीटर पहले तारा सिंह का संगम लाॅज भी है। खाती गाँव इस यात्रा मार्ग का अंतिम गाँव है, जहाँ पर सुंदर व गहरी घाटी तथा पिंडर नदी का किनारा है। खाती गाँव में पीडब्लूडी के साथ ही स्थानीय लोगों के करीब आधा दर्जन रेस्ट हाउस हैं। गाँव से आधा किलोमीटर आगे निगम का रेस्ट हाउस भी है। इस गाँव के ज्यादातर युवा पर्वतारोहण में माहिर हैं। गाँव में काली मंदिर की भी काफी महत्ता है।

खाती में आप दिन का भोजन लेकर कुछ पल आराम कर आगे की यात्रा के लिए अपने को तैयार कर लें। स्वादिष्ट भोजन यहाँ कुछ दुकानों में आपकी डिमांड पर आधे घंटे में तैयार हो जाता है।

2013 की आपदा के बाद अब यहाँ से आगे के रास्ते की हालत काफी बदल गए हैं। तब पिंडर व कफनी क्षेत्र में लगातार बारिश से पिंडर नदी में आई भयानक बाढ़ अपने साथ कर्णप्रयाग तक सभी पुलों को बहा ले गई। द्वाली से मलियाधौड़ तक पिंडर नदी के किनारे बना आरामदायक पैदल रास्ता भी इस आपदा की भेंट चढ़ गया। हालाँकि पीडब्लूडी विभाग वह रास्ता बना रहा है।

2013 से पहले खाती से आगे टीआरसी होते हुए पिंडर नदी के किनारे मलियाधौड़ को जाना होता था। अब एक नया संकरा रास्ता गाँव वालों ने काली मंदिर के बगल से पिंडर नदी के पास तक बना लिया है। रास्ते की जानकारी गाँव में मिल जाएगी कि कौन सा रास्ता अभी ठीक है।

खाती से द्वाली पहले दस किलोमीटर दूर था लेकिन अब मलियाधौड़ से पिंडर नदी के साथ-साथ दाँए-बाँए होते हुए यह करीब एक किलोमीटर ज्यादा हो गया है। वैसे रास्ते में कई खूबसूरत झरने थकान मिटाने के लिए हैं। द्वाली तीव्र पहाड़ी ढलानों के अत्यन्त संकुचित घाटी क्षेत्र में है। यहाँ पर पिंडर व कफनी नदियों का संगम होता है। पिंडर नदी आगे गढ़वाल की ओर बहकर कर्णप्रयाग में अलकनंदा से संगम बनाती है। द्वाली में पीडब्लूडी के साथ ही निगम व स्थानीय दुकानदारों के वहाँ रहने की व्यवस्था है। यहाँ से पिंडारी तथा कफनी ग्लेशियर के लिए रास्ते बँट जाते हैं।

द्वाली में रात गुजार सुबह साढ़े चार बजे उठकर पाँच बजे तक पिंडारी ग्लेशियर को चलने के लिए तय कर लें। आज फुर्किया होते हुए पिंडारी के दर्शन करने के बाद वापस द्वाली या फुर्किया पहुँचने का लक्ष्य रखें। द्वाली में आप स्थानीय दुकादार से अगले दिन दोपहर के लिए पराठे बनाने के लिए कह सकते हैं। पराठों के साथ अचार पैक कर साथ में रख लें। ये आपका दोपहर का खाना है। द्वाली लगभग 2,575 मीटर की ऊँचाई पर है। द्वाली से पिंडर नदी के किनारे धीरे-धीरे ऊँचाई को रास्ता है। फुर्किया यहाँ से पाँच किलोमीटर पर है। आराम से चलने पर समय करीब दो घंटा। लगभग 3,250 मीटर की ऊँचाई पर स्थित फुर्किया में पीडब्लूडी का रेस्ट हाउस है। यहाँ एक दुकान भी है जिसमें पर्यटक सीजन में चाय, खाना मिल जाता है। फुर्किया पहुँचने पर इस दुकान में चाय-नाश्ते का इंतजाम अकसर हो जाता है। नाश्ते के बाद आगे पिंडारी की ओर बढ़ चलें। पिंडारी फुर्किया से लगभग साढ़े आठ किमी. पड़ता है। फुर्किया से कुछ पहले टी लाईन समाप्त हो जाती है। बुराँश के साथ अन्य छोटे किस्म के नाना प्रकार के फूल-पौंधे ही मिलते हैं। धीरे-धीरे चढ़ाई लिए हुए रास्ते के किनारे मखमली घास आपकी थकान भी मिटाती रहती है। पिंडर नदी के पार ऊँची पहाड़ की चोटियों को चीरती हुई जल धाराएं बड़ी ही मनोहारी दिखती हैं। पिंडारी घाटी में पहुँचते ही एक अलग ही दुनिया में पहुँच जाते हैं। सामने छांगुच व नंदा खाट के हिम शिखर आकाश को चूमते नजर आते हैं। इनके मध्य पसरा है पिंडारी ग्लेशियर। ग्लेशियर से पहले हरे मैदान में बनी कुटिया आकर्षित करती है, जिसमें पिछले पच्चीस वर्षों से रहने वाले स्वामी धर्मानंद पिंडारी ग्लेशियर आने वाले हर पर्यटक का हर हमेशा चाय व हल्के नाश्ते के साथ गर्म-जोशी से स्वागत करते हुए मिलते हैं। कुछ पल उनके साथ बिताने के बाद पानी की बोतल में पानी भर लें और आगे चल पड़ें। यहाँ से करीब एक किमी. चलने के बाद 3,660 मीटर की ऊँचाई पर सामने पिंडारी ग्लेशियर के आप दर्शन कर सकते हैं। (जारी है)

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केशव भट्ट

केशव भट्ट उत्तराखंड से हैं और पहाड़ों पर ख़ूब घूमते हैं। अपनी घुम्मकड़ी को केवल ज़हन तक नहीं रहने देते, लफ़्ज़ों में भी उतार देते हैं वो भी बख़ूबी। पहाड़ों के भूगोल की अच्छी जानकारी रखते हैं।

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