नया यात्रा वृत्तांत- नास्तिकों के देश में: नीदरलैंड

प्रवीण झा नॉर्वे (यूरोप) में रहते हैं. हिन्दी लेखन में लगातार सक्रिय हैं. पेशे से डॉक्टर हैं और मन से यायावर. संगीत से जुड़े विषयों में उनकी खास रुचि रहती है. हाल ही में किंडल पर उन्होंने ‘नास्तिकों के देश में: नीदरलैंड’ नाम से एक रोचक यात्रा वृत्तांत लिखा है. इससे पहले एक यात्रा-संस्मरण- ‘भूतों के देश में: आइसलैंड’ और एक व्यंग-संग्रह -‘चमनलाल की डायरी’ भी किंडल पर प्रकाशित हो चुके हैं. आज पेश है उनकी नयी प्रकाशित किंडल-पुस्तक ‘नास्तिकों के देश में: नीदरलैंड’ से एक अंश.

 

एक शीशे के भीतर से झाँकती काली रेशमी टू-पीस में एक सुंदरी मेरे उस दरवाजे के आस-पास आते ही बाहर आकर मुस्कुराने लगी। मैंने स्वयं को ऊपर से नीचे देखा कि भला मुझ में मुस्कुराने के लिए क्या है? फिर याद आया कि इस वक्त मैं ग्राहक हूँ और वह विक्रेता। हमारे मध्य यही संबंध है कि वह मुस्कुराए और हम पघुराएँ। वह हमें आकर्षित करें और हम भाव-हीन रहें। हम जैसे ही मुस्कुराए, समझो हम हारे। यह अगर विक्रेता न होकर यूँ ही कोई लड़की होती तो उसकी मुस्कुराहट से शायद धड़कन तेज होती, यहाँ तो धड़कन ज्यों-की-त्यों थी। मैंने भी यूँ निहारा जैसे मैं औरों को निहारता हूँ। उसकी आँखें देख समझ गया कि यह पूरब से है। पूरब यानी अपना देस नहीं। यूरोप के अंदर भी पूरब और पश्चिम है। और यूरोप का पूरब भी पच्छिम से गरीब ही है। रोमानिया और पोलैंड के मजदूर पच्छिम की ओर वैसे ही जाते हैं जैसे बिहार-यू.पी. के मजदूर। वेश्यावृत्ति में भी पूरब की स्त्रियाँ ही हैं। उनकी पहचान है नीली आँखें, गौरांग, सुनहरे बाल और लंबी टांगों वाला छरहरा बदन। यह उच्च कोटि की वेश्यावृत्ति नहीं कर पाती, क्योंकि इनका शरीर एथलेटिक है, मांसल नहीं। इनकी कीमत सस्ती है। उच्च कोटि की वेश्या पच्छिम की हो सकती है, या स्पैनिश मूल की। अफ्रीकी वेश्या की भी ऊँची कीमत हो सकती है। गोरे अक्सर काली वेश्या ढूँढते हैं और मेरे जैसे काले-भूरे पुरूष गौरांगना ढूँढते हैं। यह शायद न्यूटन का नियम भी है। 

न्यूटन ने शाश्वत सत्यों को फॉर्मूला बना कर यूँ पेश किया कि लोगों को लगा नयी चीज बता रहा है। सेब गिरता है। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। किसी चीज पर बल न लगाओ, वह नहीं चलेगी। भला यह बातें तो मेरे गाँव का अनपढ़ भी बता दे। बस उसे लिखना, पेटेंट कराना, हौवा बनाना नहीं आता। न्यूटन को आता होगा। मुझे नहीं आता। शायद इसलिए यह मसाज़-गर्ल मुझ पर मुस्कुरा रही है। आम आदमी आम की तरह उसके सामने गिरा, और उसके मुँह से मुस्की छूटी।

मैंने अकड़ कर पूछा, “मसाज़ के क्या दर हैं?”

उसने कहा, “बस पचास यूरो।”

मैंने मन में कहा, “बस? पचास यूरो यानी पाँच हज़ार रुपए!”

फिर लगा हज़ार-दो हज़ार तो बेंगलूरी रंगरूट भी ले लेते हैं। एम्सटरडम में टू-पीस में खड़ी यह गोरी क्या ज्यादा मांग रही है? 

मैंने फिर बहाना बना कर पूछा, “आप के पास क्रेडिट कार्ड चलता है?” 

यह नपा-तुला प्रश्न था क्योंकि मेरे सामने दरवाजे पर ही अंग्रेज़ी भाषा में लिखा था- आज नगद, कल उधार। मुझे मालूम था कि उसका जवाब नकारात्मक होगा। 

उसने कहा, “ बस, वह सामने रहा ए.टी.एम.।” 

अब मैं फँस गया। यह तो मामूली सा न्यूटनिया ज्ञान था कि इतनी मशहूर जगह पर ए.टी.एम. तो होगा ही। अगर यह कुछ दूर होता तो मैं कहता कि ढूँढ कर आता हूँ। अब तो मैं नगद-केंद्र और मसाज़ केंद्र के मध्य लटक रहा था। मेरी मुक्ति अब एक ही थी कि सीधे मना कर दूँ। लेकिन शोध का क्या? 

मैंने बस पहला प्रश्न खड़े-खड़े ही दाग दिया, “तुम्हारे पास आज कितने ग्राहक आए?”

उसने मुस्कुरा कर कहा, “आप ही प्रथम हो।”

बोहनी का वक्त है। यह तो ब्रह्मसंकट! बोहनी के वक्त में मना करना तो पाप है। 

मैंने उससे सीधा ही कह दिया, “मैं ग्राहक नहीं, मैं तो बस यूँ ही।”

उसने पूछा, “आप पहली बार आए हो?”

मैंने अपने अनुभव की धौंस दिखाते कहा, “नहीं-नहीं, मैं तो अक्सर आता रहता हूँ। लेकिन इस जगह पहली बार आया।”

उसने फिर पूछा, “तुम्हें कितने यूरो देने हैं?”

मैंने कहा, “मैं बस कुछ पूछ-ताछ करना चाहता था। उसकी क्या कीमत होगी?”

वह हँसने लगी, और कहा, “पूछ-ताछ के पैसे नहीं। बस कोई ग्राहक आया, तो तुम्हें जाना होगा।”

मैंने कहा, “यूँ ही खड़े-खड़े बात करूँ या अंदर बैठ जाऊँ?”

उसने कहा, “हाँ हाँ! देख भी लो। क्या पता तुम्हें मसाज़ करने का मन हो जाए। पचास यूरो में ‘ब्लो-जॉब’ और मसाज़ दोनों।”

“और कितने समय?”

“पंद्रह मिनट।”

“और अगर अधिक देर रुकना हो?”

“पचास यूरो अगले पंद्रह मिनट के”

“लेकिन क्या तुम घड़ी निहारती रहती हो?”

“मैं तो टाइमर सेट कर देती हूँ।”

“और बाकी लड़कियाँ? यानी जो दूसरे धंधे में है?”

“उनका भी औसतन यही दर है, लेकिन मैं सेक्स अभी नहीं करती।”

“क्यों नहीं?”

“मुझे इसी में ठीक-ठाक रकम मिल जाती है। और यह मैं करती आ रही हूँ।”

“कितने साल से?”

“चार साल।”

“यहीं?”

“नहीं। यहाँ तो मैं इसी साल आयी। पहले मैं बेल्जियम में थी।”

“तुम बेल्जियम से हो?”

“नहीं। बुल्गारिया से।”

“ओह! मैं तुम्हारा नाम पूछना भूल गया।”

“मेरा नकली नाम है, जो मुझे लोग यहाँ कहते हैं।”

“नकली क्यों?”

“जो छोटा हो और बोलना आसान हो। कई देशों के लोग आते हैं।”

उससे बतियाते हुए मैं कमरे को निहारने लगा। एक चारपाईनुमा बिस्तर, जिस पर एक वेलवेट की चादर बिछी है। धीमी नीली-पीली रोशनी। एक दराजों वाली मेज। एक आईना। एक टॉयलेट सीट भी बिल्कुल सामने ही था, जिसके साथ एक सफेद मोटे प्लास्टिक का पर्दा लगा था। उसकी एक दराज आधी खुली थी, जिसमें कुछ शृंगार के हल्के-फुल्के क्रीम-पाउडर वगैरा थे। और मेज पर ही थी वह टाइमर वाली घड़ी। उस घड़ी के साथ ही निर्विकार बैठे थे – गौतम बुद्ध! 

प्रवीण झा का पूरा यात्रा-वृतांत पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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