नैन सिंह रावत : एक पहाड़ी ‘ट्रेवल सूपर हीरो’

उमेश पंत :

चलते-चलते दिमाग भी एक यात्रा पर निकल पड़ता है. वो यात्रा जो थकान के एहसास को कहीं पार्श्व में डाल देती है. कई सारे ख़याल गड़मड़ से ज़हन में छोटी-छोटी यात्राएं करने लगते हैं. ऐसी यात्राएं जिनकी कोई मंजिल नहीं होती. जिनका कोई ठीक-ठीक रास्ता भी नहीं होता. उन्हीं में से एक ये भी कि इतनी दुरूह जगहों पर ये जो लम्बे-लम्बे रास्ते होते हैं उन्हें पहली बार किसने तय किया होगा ? और कौन होगा जिसे इन रास्तों को मापने का ख़याल आया होगा ? मील के वो पत्थर रखने वाला और उन्हें मापी जा सकने वाली दूरियों में ढालने वाला कोई तो रहा होगा जो आवारगी को जीता होगा ?

ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशते हुए एक नाम याद आता है- नैन सिंह रावत. ये एक ऐसा नाम है जिसे सुनते ही इतिहास का एक नया पन्ना ही खुल जाता है.

उत्तराखंड के मध्यहिमलायी इलाक़े में भोटिया महल की सात घाटियों में से एक है- जोहार घाटी। इस घाटी से सम्बन्ध रखने वाले इस कम पढ़े लिखे लेकिन हिमालय के भूगोल का विलक्षण ज्ञान रखने वाले नैन सिंह रावत की कहानी किसी सुपरहीरो की कहानी से कम नहीं है. ब्रिटिश राज की तरफ से खूफिया यात्राएं करने वाले इस शख्स को ‘स्पाई पंडित’ के नाम से भी जाना जाता था.

नैन सिंह रावत नाम के इस शख्स में एक विलक्षण प्रतिभा थी जिसकी वजह से ब्रिटिश लोग उनके कायल हो गए. ये प्रतिभा थी उनका भूगोल का गज़ब का ज्ञान. ब्रिटिश अधिकारी उन्हें उन्नीसवीं शताब्दी के एक बड़े अन्वेषक के रूप में मानने लगे थे. ये बात हैरत में डालने वाली है लेकिन इस शख्स की इच्छाशक्ति का ही कमाल था कि नैन सिंह ने बिना ख़ास संसाधनों के हिमालय के दुर्गम इलाकों में 13 हज़ार मील से ज़्यादा की पैदल यात्रा करते हुए मध्य एशिया का एक कालजयी मानचित्र तैयार किया.

उत्तराखंड के सुदूरर्ती गाँव मिलम में 21 अक्टूबर 1830 को जन्मे थे नैन सिंह. दुर्गम गाँव में पैदा होने की वजह से किताबों ने नहीं बल्कि अनुभव ने उन्हें पहाड़ों के भूगोल का जबरदस्त जानकार बना दिया.  इस जानकारी के पीछे की वजह उनकी आर्थिक तंगी थी.  पैसों की कमी की वजह से 1852 में नैन सिंह ने अपना घर छोड़कर व्यापार शुरू कर दिया।

व्यापार के सिलसिले में कई बार वो तिब्बत गए जहां उनकी मुलाकात यूरोपीय लोगों से होती रही। इन्हीं से उन्होंने जीने की असल शिक्षा ली। यात्राएं करते, लोगों से मिलते उन्हें तिब्बती, हिन्दी, अंग्रेजी और फारसी का अच्छा ज्ञान हो गया । ब्रिटिशर्स से अपनी मुलाकातों में उन्होंने उन्हें इतना प्रभावित किया कि  1855 में रॉयल जियोग्राफिकल सोसायटी लंदन ने उन्हें मध्य हिमालय के पूर्ण सर्वे का जिम्मा सौंपा। इस जिम्मेदारी को नैन सिंह ने बखूबी निभाया भी.

उनकी प्रतिभा को देखते हुए अंग्रेजों ने उन्हें ‘स्पाई पंडित’ के विशेषण से नवाज़ा। पंडित नैन सिंह ने 1855 से 1865 के बीच कुमाऊं से काठमांडू, मध्य एशिया से ठोक-ज्यालंगु और यारकंद खोतान की तीन जोखिम भरी पैदल यात्राएं की। केवल कंपास, बैरोमीटर और थर्मामीटर की मदद से उन्होंने पूरे मध्य एशिया का विज्ञान और भूगोल से जुड़ा मानचित्र तैयार कर दिया।

इस मानचित्र ने आधुनिक युग में न केवल भारतीय उप महाद्वीप बल्कि मध्य एशिया में विज्ञान से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को समझने में बड़ी भूमिका अदा की। नैन सिंह रावत ने मध्य एशिया का जो मानचित्र बनाया उसमें दूरी की गणना उन्होंने अपने कदमों से की थी। वो 33 इंच का कदम रखते और 2 हजार कदमों को एक मील मानते थे। इसके लिए उन्होंने 100 मनकों की माला का प्रयोग किया। हर 100 कदम चलने पर एक मनका गिरा देते थे। पूरी माला जपने तक 10 हजार कदम यानी 5 मील तय हो जाते थे।

पंडित नैन सिंह रावत के जीवन पर डीएसबी परिसर हिन्दी विभाग की वरिष्ठ प्राध्यापिका  प्रो.उमा भट्ट और मशहूर इतिहासकार शेखर पाठक ने ‘एशिया की पीठ पर’ नाम से एक किताब भी लिखी है. इस किताब में नैन सिंह रावत नाम के इस अनूठे घुमक्कड़ शख्स की यात्राओं के दौरान लिखी डायरियों का संकलन भी शामिल है.

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उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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