ग़ज़ल

रद्दी के अख़बार सरीखा खाली सा बेकार सा दिन

रद्दी के अख़बार सरीखा खाली सा बेकार सा दिन

रद्दी  के  अख़बार  सरीखा खाली  सा बेकार  सा दिन

हफ़्ताभर  थक  हार के  लौटे मुर्दा से इतवार सा दिन 

 

बंज़र  नीदों में  उग  आये  नागफनी से  चुभते  ख़्वाब
दिन भर तपती रेत के ऊपर जलता एक बेज़ार सा दिन

 

वीराने   में  बहती  एक   सुनसान  नदी  के  पानी में
सूखे  मुरझाये  पत्ते को  तकती एक  मजधार सा दिन 

 

रोशनियों  में उलझी  सूरज  की  अंतिम  सांसें  थामे
शाम  को  घिरते  अंधेरे  में मरने  को तैयार  सा दिन

 

खाली जेब में मुठ्ठी भींच के मसले इच्छाओं का दिल
एक  महंगे  बाज़ार  से बैरन लौटे बेरोजगार सा दिन

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उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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