उस शाम जब मुझे लगा कि मैंने ज़िंदगी की सबसे बड़ी ग़लती कर दी है

कंचन पंत :

11 नवंबर की उस शाम मैं धौलीधार रेंज की एक पहाड़ी के ऊपर खामोश बैठी थी। मेरे देखते-देखते सूरज सामने पहाड़ी के पीछे जाकर छुप गया था…और शाम का धुंधलका कुछ ही मिनटों में अंधेरी चादर में बदल गया था। सर्दियों में पहाड़ी इलाक़ों में शाम का अस्तित्व करीब-करीब ख़त्म ही हो जाता है…सूरज डूबते ही सीधे रात! रात के मुहाने पर, एक पहाड़ी की नोंक पे, आबादी से मीलों दूर, मैं अकेले बैठी थी…एकदम अकेले! और इन कुछ ही पलों में मुझे अहसास हो गया था कि शायद मैं अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ग़लती कर चुकी हूं।

इस मोमेंट ऑफ रियलाइज़ेशन की शुरुआत शायद ये नहीं है…अब से 12 घंटे पहले यूं ही ले लिया गया फ़ैसला भी इसकी शुरुआत नहीं है…मेरे इस लम्हे तक पहुंचने की शुरुआत शायद कई महीने पहले मुंबई की एक मल्टीस्टोरी बिल्डिंग की बॉलकनी में हो चुकी थी। उन दिनों में डिप्रेशन से घिरी हुई, मैं अपनी अस्तित्व से जुड़ी हर चीज़ को सवालिया नज़रों से देख रही थी। अतीत पीछा नहीं छोड़ रहा था, और भविष्य दिखाई नहीं दे रहा था…एक धुंध थी, जो पूरे वजूद पर छाई हुई महसूस होती थी। इमोशनल स्लोडाउन कहूं, डिप्रेशन कहूं, थकन कहूं…पर ये वो वक्त था, आप भाग जाना चाहते हैं। ये भागना,किसी से भागना नहीं होता, किसी की तरफ़ भागना भी नहीं…बस आप उस धुंध से निकल जाना चाहते हैं… इसी छटपटाहट में मैंने भाग जाने का फ़ैसला किया…और जगह चुनी हिमाचल प्रदेश।

कोई प्लान नहीं था यहां आने से पहले, कुछ सोचा नहीं था कि कहां जाऊंगी, क्या करूंगी। मुझे प्लान करके यात्राएं करना पसंद नहीं…बड़ी कोफ़्त होती है, अगर कोई घूमने जाने से पहले उस जगह की हिस्ट्री, ज्योग्राफ़ी गूगल पर सर्च करता है…फलां जगह कैसे जाएं, क्या खाएं, कहां ठहरे, क्या देखें जैसी जानकारियां मुझे बोझिल लगती हैं। मैं एविड ट्रैवलर नहीं हूं,लेकिन हर यात्रा मेरे लिए ऐसी कहानी है, जो ख़ुद ही खुद को लिखती है, इसलिए मैं बहुत अनऑर्गनाइज़्ड ट्रैवलर हूं। 

खैर, लौटती हूं 11 नवंबर की सुबह। मैं हिमाचल प्रदेश के बीड़ नाम के कस्बे के एक होटल में ठहरी थी, होटल की बालकनी में ठिठुरते हुए हाथों में चाय थामे हुए बिलिंग की पहाड़ियों को देख रही थी। बीड़ समुद्र तल से कोई 4300 फुट, यानी करीब 1300 मीटर की ऊंचाई पर है, यहां से कोई 1100 मीटर ऊंचाई पर है बिलिंग। सूरज की रोशनी, पहाड़ी पर धीरे-धीरे फिसलते हुए नीचे आ रही थी। अगली सुबह मुझे वहीं जाना था…फिर वहां से पैराग्लाइडिंग करके यहीं बीड़ लौट जाना था… लेकिन कल क्यों? आज ही क्यों नहीं? मेरे अंदर से कोई बोला। अगले कुछ सेकेंड में मैं तय कर चुकी थी कि आज ही बिलिंग जाऊंगी, पैदल जाऊंगी और अकेले जाऊंगी। मैं पहाड़ से हूं, पहाड़ से प्यार करती हूं, पहाड़ से खिंचाव महसूस करती हूं,इसलिए पहाड़ चढ़ना इतनी बड़ी बात नहीं थी, कम से कम उस वक्त तो ऐसा ही लगा, मुश्किल ये थी कि मैं रात को बिलिंग में कैंपिंग करना चाहती थी, सुना था वहां बहुत सारे कैंप साइट हैं,जहां बर्फ पड़ने तक पर्मानेंट टैंट लगे रहते हैं। टैंट अब भी थे वहां, लेकिन कैंपिंग का सीज़न ख़त्म हो चुका था…और ये मौका मेरे हाथ से निकल चुका था। 

​​मैं जिस मनोस्थिति में हिमाचल आई थी, हार जाने,टूट जाने, कुछ खो जाने के अहसास के साथ, इस वक्त वो अहसास कई गुना होकर मुझपर तारी हो गया। इस अहसास के साथ वापस जाना…ये रिस्क नहीं लेना चाहती थी…इसलिए मैंने एक दूसरा रिस्क लिया। दोपहर होते-होते मैं एक अनजान रास्ते पर निकल पड़ी, जिसके दूसरे छोर पर बिलिंग था…जहां शाम के छह बजे घने जंगल के बीच मैं अकेले बैठी, उस पल को कोस रही थी जब मैंने अकेले ट्रैकिंग और फिर कैंपिंग करने का वाहियात फैसला किया था। छह किलोमीटर की सीधी चढ़ाई के बाद, वो भी तब जबकि चलने की आदत करीब-करीब ख़त्म हो चुकी हो, तब शरीर को थक कर चूर हो जाना चाहिए, लेकिन इस वक्त मुझपर सिर्फ एक अनजाना डर हावी था, जिसे बिलिंग की खूबसूरत पहाड़ियां भी दूर नहीं कर पा रही थीं। 

बिलिंग बेहद खूबसूरत हिलटॉप है…यहां हर साल हज़ारों लोग दुनियाभर से पैराग्लाइडिंग के लिए आते हैं। पैराग्लाइडिंग के लिए दुनिया की सेकिंड हाईएस्ट पीक है ये…ये बात बीड़,बिलिंग या आस-पास के इलाक़े के लोग आपको बार-बार याद दिलाते हैं। और ये पूछने पर कि पहली पीक कौन सी है, अक्सर लोग मासूमियत से जवाब देते हैं कि- वो तो फॉरेन में है ना। तो एक तरफ़ पूरी दुनिया, और दूसरी तरफ़ उनका अपना बिलिंग। अपने इलाक़े, अपनी चीज़ों के लिए गर्व की ये भावना मुझे अंदर तक छू जाती है। 2015 में करीब इन्हीं दिनों बिलिंग में पैराग्लाइडिंग वर्ल्ड कप भी ऑर्गेनाइज़ किया गया था…ये बात अब से थोड़ी देर पहले हिलटॉप पर बनी चाय की एक दुकान वाले ने बताई थी। वो इस पहाड़ी पर मुझे दिखा आखिरी मनुष्यजात था, जो अब दुकान बंद करके जा चुका था। यानी कल सुबह तक इस वीरान, सुनसान पहाड़ी पर मैं बिल्कुल अकेली थी, अगर कल सुबह तक ज़िंदा रह पाई तो! दिन की रोशनी में पहाड़ी ख़ूबसूरत थी, पेड़-पौधे सुकून पहुंचा रहे थे,खामोशी सहला रही थी, पर रात मेंरात में ये सब रूप बदलकर आ गए थे। जितने डर एक इंसान के अंदर छुपे हो सकते हैं, वो सब मेरे आसपास नाचने लगे। क्या होगा अगर कोई जंगली जानवर मेरी गंध सूंघता हुआ आ जाए? या किसी इंसान को एक अकेली लड़की के यहां होने की भनक लग जाए,या गहरे अंधेरे और सन्नाटे की भांय-भांय में दिल ही घबराकर धड़कना छोड़ दे, या कोई भूत पिचासआखिर इतने लोग कहते हैं, तो झूठ तो नहीं कहते होंगेहज़ारों संभावनाएं, और हर संभावना के उतने ही कॉन्सिक्वेंशेज़ 10 मिनट के उस अंधेरे,उस अकेलेपन, उस सन्नाटे ने ही मुझे अंदर तक हिला दिया था। वापसी का अब कोई रास्ता नहीं था…यहां से सबसे नज़दीक जो इंसानी आबादी थी, वो भी 6 किलोमीटर दूर थी, और ना जाने किस दिशा में थी…तो तय था कि आज की रात मुझे यहीं काटनी थी, चाहे जीकर या मर कर। आसपास बिखरी लड़कियों के साथ-साथ मैं अपनी हिम्मत भी बटोर रही थी,कोशिश कर रही थी कि आंसू ना आएं, रोना ना आए। 

मुझे बहुत जलन होती है उन लोगों से, जो खुलकर रो पाते हैं…अपनों के सामने, अनजानों के सामने…बिना झिझक रो लेते हैं। मैं नहीं रो पाती…जब रोना चाहती हूं, तब भी नहीं…जब कोई रोने के लिए कंधा देने को तैयार हो, तब भी नहीं…और कभी रो भी देती हूं, तो महीनों अपराधबोध, गिल्ट और शर्म में घुलती रहती हूं…पर यहां कौन था, जो मुझे रोते हुए देखता? यहां मैंफूट-फूट कर रो सकती थी…पर मैं अपने आंसू रोकते हुए लकड़ियां जला रही थी। कैंप फायर नहीं कहूंगी उसे…ये इस वक्त एक संधि वार्ता का मंच था…जिसमें एक तरफ़ मैं थी, जो डरी हुई थी…घबराई हुई थी…सेल्फ क्वेश्चनिंग से घिरी हुई थी…और दूसरी तरफ़ भी मैं ही थी, जिसे पता नहीं था कि मैं यहां क्यों आ गई थी।

क्या मैं दबे-छुपे कहीं मर जाने का ऑप्शन तलाश कर रही थी?या फिर किसी छिपी हुई कमज़ोरी से पार पाने के लिए मेरे मन ने मुझे ये ख़तरनाक कदम उठाने को मजबूर कियाक्या मेरा यहां इस तरह अकेले चला आना मेरा ख़ुद को झिंझोड़ने, अपने कंफर्ट ज़ोन से बाहर आने रास्ता था? या फिर इन टू द वाइल्डजैसी किसी फिल्म से चुराया हुआ फैसिनेशन? उस एक घंटे में हज़ारों बार मैंने ख़ुद से ये सवाल किए। इस दौरान थोड़ी वाइन भी मैं पी चुकी थी। फोन की बैटरी लो-पॉवर मोड पर आ चुकी थी…दुनिया से जोड़ कर रखने वाला (चाहे बिना सिग्नल के ही सही) आखिरी माध्यम भी दम तोड़ने वाला था। 

उन पलों में मैंने दो लोगों के लिए मैसेज लिखा, उन दो लोगों के लिए जो मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण थे…आखिरी संदेश ही कह लीजिए। जिस वक्त ये मैसेज लिख रही थी, मेरे दिमाग में सिर्फ वो दो लोग थे, उनके लिए जो मैं महसूस करती हूं वो था, उनसे जो कहना चाहती हूं वो था…बाकी कुछ नहीं…ना कोई शिकायत, ना अपेक्षा, ना रिग्रेट, ना गिल्ट, ना उनके साथ अपने रिश्ते का बोझ, ना उस रिश्ते में अपनी जगह का कन्फ्यूज़न। अति भावुकता में लिखे हुए वो मैसेज, जो किसी को भेजे नहीं गए, जो उस वक्त भेजे नहीं जा सकते थे, जो इस उम्मीद में लिखे गए थे कि अगर मैं मर गई, तो शायद कोई उन तक पहुँचा दे, वो मैसेज अब भी फोन में सेव्ड हैं। उन्हें हटाऊंगी नहीं कभी, संभालकर रखूंगी, पढ़ती रहूंगी, क्योंकि वो ऑनेस्ट इमोशन हैं…

शायद यही वो पल थे, जब अचानक धुंध छंट गई। इस अंधेरे में अचानक मुझे सबकुछ साफ़-साफ़ दिखाई देने लगा। पिछले कई महीनों से जो सवाल रुला रहे थे, अचानक ही उनके जवाब मिल गए। सवाल क्या था, जवाब क्या, ये मायने नहीं रखता…बस इतना मायने रखता है कि ज़िंदगी के चले जाने के डर ने मुझे एक बार फिर ज़िंदगी से मिला दिया, जैसे कैमरे के लैंस से खेलते हुए, किसी ने मेरी प्रायोरिटीज़ पर कैमरा फोकस कर दिया हो। यही था शायद इस यात्रा का मकसद…मैं भागने के लिए नहीं आई थी, यहां इस पहाड़ी पर अकेले…ख़ुद से मिलने आई थी। ये अहसास हो जाने के बाद, रात डरावनी नहीं रह गई थी। जब तक आग जलती रही, मैं बाहर बैठी रही…बादलों की ओट से झांकते कुछ तारों से बात करती रही (लिटरली)…फिर ठंड, थकान और वाइन का सुरूर हावी होने लगा तो खाली पड़े एक टैंट में घुसकर सो गई। नींद फिर सुबह ही खुली…सुबह-सवेरे ही चहलपहल होने लगी थी,पैराग्लाइडिंग के लिए लोग आने लगे थे, मेरे पायलेट के आने से पहले मैं पहाड़ियों पर घूमने निकल गई…इस दुनिया को एक नई नज़र से, एक नए नज़रिए से देखने

सबके लिए यात्राओं के अलग-अलग मायने हैं, कोई इन यात्राओं से दुनिया देखना चाहता है, कोई संसार को समझना चाहता है, कोई ज्ञान बांटना चाहता है, तो कोई ज्ञान हासिल करना चाहता है…मेरे लिए यात्राएं सिर्फ ख़ुद को खोजने की सतत प्रक्रिया है। ये आखिरी बार नहीं है…मैं जानती हूं, ऐसा वक्त फिर आएगा ज़िंदगी में, जब कुछ नज़र नहीं आएगा,जब मैं खुद को खो दूंगी, जब मैं ख़ुद को दुनिया के तौर-तरीकों के हिसाब से बदलने की कोशिश कर रही होऊंगी…तब मैं फिर भाग कर आऊंगी…ऐसी ही किसी पहाड़ी पर, या किसी जंगल में, या किसी नदी के किनारे, या किसी गुफा के अंदर, या किसी वीरान सूनसान रास्ते पर, खुद ही से मिलने!

Please follow and like us:

कंचन पंत

कंचन पंत लेखिका हैं, पत्रकार हैं और कॉंटेंट प्रोजेक्ट में क्रिएटिव हेड हैं। एनडीटीवी जैसे संस्थानों के साथ टीवी पत्रकारिता की दुनिया में ख़बरों से जूझने के बाद उन्होंने अपनी ज़िंदगी की कहानी में एक ट्विस्ट दिया और कहानियों का हाथ थाम लिया। अब आलम ये है कि उनकी लिखी 200 से ज़्यादा कहानियां रेडियो पर प्रसारित हो चुकी हैं। ‘बेबाक़’ नाम से कहानियों की एक किताब भी लिख चुकी हैं।पहाड़ों से उनका प्यार फ़िलहाल उन्हें मायानगरी मुम्बई की दुनिया से उत्तराखंड लौटाकर ले आया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *