एक दिन मुम्बई के गोराई बीच पर


प्रशांत तिवारी उत्तर-प्रदेश के जौनपुर के रहने वाले हैं. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है. फ़िलहाल भोपाल में रहते हैं और यात्राओं का शौक़ रखते हैं. मुम्बई के गोराई बीच की यात्रा का वृत्तांत उन्होंने हमें लिख भेजा है. आप भी उनकी यात्रा का लुत्फ़ लीजिए.

कभी-कभी जब बिना प्लान किए कहीं निकलो और उसपर भी रास्ता भटक जाओ तो एक नई और खूबसूरत जगह मिल जाती है, एक ऐसी जगह जहाँ आप जाना तो चाहते थे लेकिन आपको पता नहीं था उस जगह के बारे में। मुझे लगता है कि अचानक से होने वाली यात्राएं और उसी यात्रा में अचनाक से कोई नई जगह मिल जाना ज़्यादा मज़ेदार और रोमांचक होता है। 

मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही वाकया हुआ जब पिछले महीने मैं मुंबई गया था। घूमने के उद्देश्य से तो गया नहीं था एक रिलेटिव के बीमार होने की वजह से जल्दबाज़ी में दिल्ली से मुंबई जाने वाली एकमात्र बस से 30 घंटे में मुंबई पहुंचा था। हालाँकि इस लम्बे रास्ते में भी कई सारी बातें हैं बताने को लेकिन वो सब अभी नहीं। तो मैं मुंबई पहुचं गया, जिनका इलाज होना था हुआ सब कुछ ठीक हो गया अब बारी थी वापस आने की। इससे पहले मैं 3-4 बार मुंबई जा चुका था लेकिन कहीं घूमना नहीं हो पाया था. इस बार भी ऐसी सिचुएशन में गया था कि घूमने की कौन सोच रहा था लेकिन आने से एक दिन पहले अचानक से प्लान बन गया. मुंबई में सबसे पहली जगह जहाँ मैं जाना चाहता था वो था खूबसूरत बीच. मैं समंदर को करीब से देखना चाहता था, उसकी लहरों को महसूस करना चाहता था। सोच रहा था बस इतना ही हो जाए बाकि और कहीं घूम पाऊं या ना घूम पाऊं।

मैं मलाड में रुका हुआ था और वहां से अक्सा बीच नज़दीक था तो मैंने अपने दोस्तों से कहा घूमने के लिए, जो कि मुंबई में ही रहते हैं। तो उन्होंने कहा कि अक्सा बीच उतना अच्छा नहीं है तो मैंने जुहू बीच चलने को कहा तो एक दोस्त ने एक नई जगह के बारे में बताया, बोला कि गोराई बीच चलते हैं वो अच्छा है। मुझे तो बस किसी अच्छे बीच पर जाना था चाहे किसी पर जाऊं, तो मैं तो तुरंत तैयार हो गया। हम चार लोग दो बाइक लेकर निकले, मेरे एक दोस्त ने ऑफिस के रस्ते से लौटकर छुट्टी ले ली बीमारी का बहाना करके और बाकि दो का फील्ड जॉब था तो उन्होंने ने भी अपना काम झोले में डाला और निकल पड़े मुझे साथ लेकर। ये बड़ी बात लगती है मुझे, तीन लोग आपके लिए अपना काम छोड़कर निकल पड़े। 

तो हमलोग बोरीवली से फेरी पर अपनी बाइक चढ़ाई और एक छोटी सी झील पार करके शहर के दूसरी तरफ पहुँच गए जो मुंबई शहर की भीड़भाड़, गाड़ियों, सड़कों और चकाचौंध से बिलकुल अलग शांत, जंगली और हराभरा इलाका था। अगर किसी को अचानक से सीधा उस जगह पर ले जाकर छोड़ दिया जाए तो वो बता भी नहीं पाएगा कि वो मुंबई में ही है। फिर हम मैंग्रोव के जंगलों (जिसे मेरे एक दोस्त ने अरहर बताकर मुझे प्रभावित करने की कोशिश की थी कि उसे बहुत कुछ पता है यहाँ के बारे में) से होते हुए पगोड़ा नमक जगह पहुंचे जो पगोड़ा नाम के एक बौद्ध मठ के लिए प्रसिद्ध है, बहुत ही खूबसूरत और शांत इलाका और बौद्ध मंदिर होने के कारण बहुत ही पॉज़िटिव माहौल लग रहा था। वहीँ एक कर्मचारी ने 10 दिनों की निशुक्ल विपश्यना के बारे में बताया जो कई शहरों में होती है, इतना प्रभावित हुआ मैं कि लगा अगली छुट्टी लूंगा तो विपश्यना पर ही जाऊंगा। 

हमलोग कुछ देर उस शांत माहौल में बैठकर वहां से गोराई बीच के लिए निकले जहाँ के लिए ये यात्रा शुरू हुई थी। अब निकले तो बस रास्ते ही रास्ते, पत्थर, छोटे टीले, मैदान, इक्का दुक्का झोपड़ियां, मैंग्रोव की झाड़ियां और आते जाते कुछ लोग। चलते जा रहे हैं लेकिन रास्ता ख़त्म ही नहीं हो रहा लग रहा, अब आया बीच अब आया लेकिन रास्ता बढ़ता ही जा रहा था। हम अभी गोराई गांव में थे, थककर किसी से पूछ तो पता चला कि रास्ता भटक गए फिर वापस मुड़े लेकिन अभी ध्यान इस पर नहीं था कि रास्ता भटके हैं क्योंकि जगह इतनी खूबसूरत लग रही थी कि लगा यहाँ घूम लो पहले बीच पर तो चल ही लेंगे। बीच में सड़क और सड़क के दोनों किनारे केले, नारियल, ताड़ और तमाम जंगली पेड़। बीच में कहीं कोई कोई महिला या पुरुष नारियल, केले और ताड़ बेचता मिल जाता तो कहीं एक पेड़ के नीचे कोई बैलगाड़ी दिख जाती, फिर कहीं-कहीं छोटे-छोटे तालाब और उनमें तैरती नावें भी दिख जाती।

हर जगह लगता कि थोड़ी देर यहाँ रुक जाएं, थोड़ा घूम लें फिर चलें आगे। और बीच में ऐसे-ऐसे घर दिख जाते जिसमें दिखता तो कोई नहीं था लेकिन वो पेड़ों से ऐसे घिरे हुए थे कि मन कर रहा था कुछ दिन के लिए यहीं रुक जाएं बिना किसी से बताए। और इस भटके हुए रास्ते की सबसे खूबसूरत बात ये थी कि थोड़ी-थोड़ी दूर पर जाकर कोई पगडंडी दिख जाती थी जो जंगल की दूसरी तरफ निकलती थी लेकिन उसका अंत नहीं दिखता था। ये पगडंडियां देखने में ही इतनी खूबसूरत लगती थीं कि लगता था बाइक रोको और इस पगडण्डी का पीछा करो। गोराई गांव में कई सारे ऐसे रिज़ॉर्ट बने हुए थे जो सामने से तो नहीं दिखते हैं बस उनके रास्ते दिखते हैं, पगडंडी पकड़ के जाइए कुछ दूर बाद आपको एक खूबसूरत और रोमांटिक रिज़ॉर्ट मिल जाएगा प्रकृति की गोद समाया हुआ।

उस एरिया में ऐसे बहुत सारे रिज़ॉर्ट और रेस्त्रां थे और उसके साथ जंगल और इक्का दुक्का घर और झोपड़ी भी थी जहाँ गांव वाले रहते थे और कुछ फल फूल और और रेस्त्रां का काम करते हैं। मुंबई में रहने वाले बहुत से लोगों को शायद इस जगह के बारे में पता ना हो कि उनके शहर से कुछ दूर पर ही ऐसी एक खूबसूरत जगह है जहाँ वे एक दो घंटे में पहुचं जाएंगे और उन्हें छुट्टियां मनाने के लिए कहीं दूर नहीं जाना पड़ेगा। सुबह बीच पर जाइए ताज़े नारियल का पानी पीजिए, दोपहर जंगलों में घूमते हुए और अलग अलग डिश का आनंद लीजिए और फिर शाम को बीच पर ढलते सूरज की खूबसूरती निहारिए और रात को रिज़ॉर्ट में आनंद लीजिए। इससे बढ़िया वेकेशन क्या होगा। ना ज़्यादा दूरी ना ज़्यादा प्लानिंग न ही ज़्यादा वक्त निकालना होगा। 

तो तीन-चार बार रास्ता भटकने और हर बार एक नई और खूबसूरत जगह पहुँच जाने के बाद आखिर में हमें गोराई बीच का रास्ता मिल गया और तब पता चला कि हम पगोड़ा से निकलकर बीच की तरफ जहाँ से मुड़े थे उससे 100-200 मीटर की दूरी पर ही बीच था लेकिन मैं तो बहुत ही खुश था कि अच्छा हुआ भटक गए रास्ता नहीं तो पता ही नहीं चलता कि आगे कितनी खूबसूरत जगहें हैं। मुझे तो और आगे जाने का मन कर रहा था लेकिन फिर हमें बीच भी जाना था और लौटना भी था। 

हमलोग करीब 3 बजे की दोपहर में बीच पर पहुंचे तो ज़्यादा भीड़ नहीं थी क्योंकि बीच पर ज़्यादातर लोग शाम में ही आते हैं अच्छा ही था भीड़ कम थी, शांति थी। मैं जल्दी से जूते उतारकर पहुंच गया समंदर में उसको देखने और उसको महसूस करने। कुछ देर बस समन्दर के मछुआरों, चमकते सूरज और सूरज की रौशनी से चमकती नावों और जहाजों को देखता रहा। कुछ देर बाद अचानक से लगा कि पानी तो लगातार ऊपर पहुंच रहा है और मैं जहाँ जूते रखकर आया था वहां तक तो पानी पहुँच चुका है। शाम होने लगती है तो समन्दर का पानी धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहता है और फिर वापस लौटता है। पानी बढ़ता गया तो मैं और किनारे आता गया लेकिन समंदर से निकलने का मन नहीं हो रहा था। लेकिन मन मसोसकर हम वहां से निकले और फिर ताज़ा नारियल पानी पिया अब बीच पर आए और नारियल पानी ना पिया तो क्या किया।

आगे जाकर एक और चीज़ मिली ताड़ी का फल जिसे तारकुन कहते हैं जो मैंने पहली बार खाया। बड़ा ही स्वादिष्ट और मीठा था। खाकर मज़ा आ गया। तारकुन खाकर निकले तो फिर रास्ता अब शहर की ओर बढ़ रहा था और धीरे-धीर हम शहर की उसी भीड़ और गाड़ियों के रेले में पहुँच गए लेकिन कई दिनों तक वो गोराई बीच और भटके हुए खूबसूरत रस्ते याद आते रहे। मुंबई वालों के लिए एक खूबसूरत जगह है जहाँ उन्हें शहर की भागमभाग से बहुत राहत मिलती है। 

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