गंगा का शांत किनारा और पटना वॉटरफ़ॉल : ऋषिकेश यात्रा-1

ऋषिकेश यात्रा का यह वृत्तांत दो हिस्सों में है. यहां पेश है पहला भाग 

पहला दिन 

गंगा नदी के शांत किनारे में बीती शाम 

29 अक्टूबर के सुबह पौने सात बजे हम नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर थे. देहरादून शताब्दी एक्सप्रेस से हमें हरिद्वार पहुँचना था और वहां से आगे ऋषिकेश हमारे इस सफ़र की मंज़िल थी. ग़ाज़ियाबाद, मेरठ, मुज़फ़्फ़रनगर, सहारनपुर और रुड़की होते हुए ट्रेन ने ठीक साढ़े ग्यारह बजे हमें हरिद्वार पहुचा दिया. यानी क़रीब साढ़े चार घंटे में हम उत्तराखंड की इस प्रसिद्ध नगरी हरिद्वार में थे जो गंगा नदी के किनारे लगने वाले कुंभ मेले के लिए भी जानी जाती है.

हरिद्वार से ऋषिकेश के लिए हमने यानी मैंने और आस्था ने टुकटुक बुक कर लिया. टुकटुक वाला बारगेनिंग के बाद 500 रुपए में ऋषिकेश छोड़ने को राज़ी हुआ. हरिद्वार रेलवे स्टेशन से हम ऋषिकेश में तपोवन की तरफ़ बढ़ गए जहां हमारा होटल बुक था. यह क़रीब 32 किलोमीटर का सफ़र था. सड़क बहुत अच्छी नहीं थी उसपर टुकटुक हमें खड़खड़ाहते हुए आगे ले जा रहा था. अच्छी बात यह थी कि रास्ते का ज़्यादातर हिस्सा राजाजी नैशनल पार्क के किनारे से गुज़र रहा था जिसकी वजह से हवा की ताज़गी को हम साफ़ महसूस कर पा रहे थे. स्मौग से भरी हुई दिल्ली की ज़हरीली हवा से यहां आकर एक अलग ही राहत महसूस हो रही थी. रास्ते भर साइन बोर्ड लगे हुए थे जिनपर लिखा था कि यहां जंगली जानवरों का ख़तरा है. खासकर बाघ और हाथी यहां की सड़कों पर कभी देखे जा सकते हैं इसलिए यह चेतावनी ज़रूरी भी थी. 

सड़क किनारे बीच-बीच में गंगा नदी भी नज़र आ रही थी. रेलवे क्रोसिंग पार कर हम ऋषिकेश की सीमा में आ गए थे. शहर के ट्रेफ़िक से निजात पाने के लिए टुकटुक वाला हमें छोटी-छोटी गलियों से हमारे आज के पड़ाव यानी तपोवन की तरफ़ ले आया. 

अपने होस्टल पहुंचकर देखा तो आस्था का फ़ोन टुकटुक में ही छूट गया था जी फ़ोन पर बड़ी जद्दोजहद के बाद दुबारा वापस मिल पाया. टुकटुक वाला ख़ुद फ़ोन लेकर वापस आ गया. हालाकि इसके 500 रुपए उसने अलग से ले लिए. 

होस्टल में कुछ देर आराम करने के बाद हमने लंच किया और फिर गंगा नदी की तरफ़ बढ़ गए. पिछली बार भी जब हम ऋषिकेश आए थे तो हम तपोवन के पास गंगा नदी के किनारे बने इस छोटे से बीच पर आए थे. डूबते सूरज के तले शांति से बहती साफ़-सुथरी गंगा नदी को देखते रहना वाकई काफ़ी सुकून दे रहा था. यहां कई राफ़्ट भी आ जा रहे थे. ऋषिकेश की राफ़्टिंग के अंतिम पड़ावों में से एक तपोवन का यह बीच भी है. हमने मन बना लिया था कि इस बार हम भी राफ़्टिंग करेंगे. 

अंधेरा होने से पहले हम होस्टल वापस लौट आए. होस्टल के रूफ़टॉप रेस्टोरेंट में रात का खाना खाते हुए हमने अगले दिन की योजना बना ली थी. 


दूसरा दिन 

पटना वॉटरफ़ाल का खूबसूरत ट्रैक 

सुबह-सुबह उठने के बाद हमने चाय पी और तय किया कि नाश्ता जर्मन बेकरी में किया जाएगा. यह लक्ष्मण झूला से लगा हुआ ऋषिकेश का एक मशहूर रेस्टोरेंट है. रेस्टोरेंट के एकदम सामने गंगा नदी और उसके घाट दिखाई देते हैं और उस नदी को पार करने के लिए बना लक्ष्मण झूला भी शीशे की खिड़कियों के एकदम सामने नज़र आता है.

 

नाश्ता करने के बाद हमने तय योजना के मुताबिक पटना वॉटरफ़ॉल की तरफ़ रूख किया. लक्ष्मण झूला क्रॉस हम वॉटरफ़ॉल के लिए गाड़ी तलाशने लगे. लेकिन यहां पता चला कि हमें गाड़ी बुक करनी होगी. तीन किलोमीटर की दूरी के लिए टैक्सी वाले 1000 रुपए मांग रहे थे. हमने तय किया कि हम पैदल ही उस तरफ़ चल पड़ेंगे और रास्ते में कोई गाड़ी मिली तो देख लेंगे. गूगल मैप देखते हुए हम सड़क के किनारे-किनारे चलते रहे. सड़क के एक तरफ़ घना जंगल था और दूसरी तरफ़ गंगा नदी बहती हुई दिखाई दे रही थी. 

तीन किलोमीटर चलने के बाद हम गरुड़ चट्टी में थे. यहां आकर पता चला कि मैप ने हमें ग़लत जानकारी दी थी. वॉटरफ़ॉल यहां से अभी तीन किलोमीटर और दूर है. और फिर वहाँ से क़रीब आधे घंटे की पैदल ट्रैकिंग भी है. ख़ैर यहां हमने एक कार से लिफ़्ट ले ली. कुछ ही मिनटों में हम उस जगह पर थे जहां से पैदल ट्रैक शुरू होता है.

यह क़रीब पौने घंटे का ट्रैक था. जंगल के बीच हल्की-हल्की चढ़ाई थी और एक कच्चा खड़ंजा बना हुआ था. ऊपर पहुँचे तो सामने एक खूबसूरत झरना था. एक ऊंचा पहाड़ था जिससे पानी की कई छोटी-छोटी धाराएं फूट रही थी जो सूरज की रोशनी में और खूबसूरत दिखाई दे रही थी. पता चला कि पास ही में पटना नाम का एक गाँव है जिसके नाम पर ही इस झरने का नाम रखा गया है. ऊँचे पहाड़ से गिरते हुए इस खूबसूरत झरने को देखकर नहाने का मन करने लगा था. लेकिन हम अलग से कपड़े साथ लाना भूल गए. तो थोड़ा बहुत भीगकर ही हमें काम चलाना पड़ा. 

 

कुछ देर झरने के नीचे बने छोटे से तालाब में पैर डुबाकर हम पास ही में चाय ठेले पर चले आए. यहां चाय के साथ गर्मागर्म मैगी खाकर हम कुछ देर सुस्ता भी लिए. पानी को बहते हुए देखने का अपना एक अलग सुख है. इतनी ऊंचाई से झरते झरने की जो रवानगी होती है वो आपको ऊर्जा से भर देती है. 

  क़रीब घंटा भर इस शांत सी जगह पर बिताकर हम लौट आए. नीचे सड़क पर आकर हमें ऋषिकेश जाने के लिए आसानी से एक गाड़ी भी मिल गयी. बीच में एक रास्ता नीरगढ वॉटरफ़ॉल की तरफ़ भी जा रहा था. हम अपनी पिछली ऋषिकेश यात्रा में नीरगढ झरने तक गए थे. यह झरना भी तपोवन से क़रीब चार किलोमीटर की दूरी पर है.

ऋषिकेश लौटकर हम लंच के लिए तत कैफ़े में चले आए. यहां से गंगा नदी और उसके किनारे बने ऋषिकेश का खूबसूरत नज़ारा दिखाई देता है. यहां के घाट और रंग-बिरंगे आश्रम भी इस कैफ़े से दिखाई दे रहे थे. एक बैल कैफ़े के अंदर चला आया था और विदेशी पर्यटक कौतूहल के साथ उसकी तस्वीरें खींचने लगे थे. इस कैफ़े में एक बालकनी भी बनी है. यहां बैठकर सूर्यास्त का खूबसूरत नज़ारा देखने को मिलता है.

 

शाम होते-होते हम अपने होस्टल में आए. रात को देर तक छत पर बैठे ग़ज़ल सुनते रहे. सोने से पहले अगले दिन राफ़्टिंग करने की योजना भी बन गयी थी.

जारी…

ऋषिकेश यात्रा का दूसरा भाग यहां पढ़ें

Written by 

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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