दार्जिलिंग मेरे बचपन का स्विट्ज़रलैंड है : भाग-3

प्रतीक्षा रम्या कोलकाता में रहती हैं. पत्रकारिता की छात्रा रही हैं. उन्होंने कोलकाता से दार्जिलिंग की अपनी यात्रा की कहानी विस्तार से हमें लिख भेजी है. आज पेश है इस यात्रा वृत्तांत का तीसरा और आख़री भाग. ये रहा इस यात्रा वृत्तांत का पहला और दूसरा भाग.

अगली सुबह लगभग 6 बजे मेरी आँख खुली।पहले दिन की इतनी थकावट के बावजूद भी सुबह इतनी जल्दी नींद खुल गयी और सच कहूं तो जितनी ताज़गी मुझे उस दिन महसूस हो रही थी वो आज तक कभी नहीं हुई। और होती भी कैसे न। उस दिन मेरी नींद पास के महाकाल मंदिर में होने वाली सुबह की आरती से खुली थी। कितनी शांत थी वो सुबह। एक पल को लगा कि काश मेरी हर सुबह ऐसी ही शांत होती। पर अगले ही पल इस बात का एहसास हुआ कि अगर हर सुबह ऐसी ही होती तो शायद मेरे लिए ये आम बात हो गयी होती और मैं कभी भी पहाड़ों के बीच सुबह 6 बजे मंदिर की घंटी और आरती की आवाज़ से नींद खुलने के खूसबूरत एहसास से रूबरू नहीं हो पाती। जीवन में कुछ एहसासों का अनुभव बस एक ही बार होता है और उस एक अनुभव में ही आप अपनी पूरी ज़िन्दगी जी लेते हैं। आपको दूसरे किसी ऐसे एहसास की ज़रूरत महसूस ही नहीं होती है।

बालकनी में उठ कर गयी तो देखा मौसम ने हल्की करवट ले रखी थी। उस दिन ठंडी हवाएं थोड़ी ज़्यादा ही तेज़ चल रहीं थीं। शायद पहाड़ों ने नींद से जागते हुए मीठी सी अंगड़ाई ली थी। और देखते ही देखते पहाड़ आसमान की गोद में समा गया। चारों तरफ़ सिर्फ़ बादल ही बादल। मेरी आँखों के सामने बादल हौले हौले पहाड़ों को अपनी आगोश में भर रहे थे। मुझे समय का कोई आभास नहीं रह गया था। मेरे आस पास सब कुछ ठहर चूका था।

उस पल में अगर कुछ यथार्थ था तो बस मेरी उँगलियों को छू कर गुज़र रहे बादल। वो मुझसे बातें करते हुए जा रहे थे। कह रहे थे कि कहाँ उलझी पड़ी हो। चलो मेरे साथ। तुम्हें एक दूसरी दुनिया में ले चलता हूँ, जहाँ सिर्फ़ तुम और मैं होंगे। मैं तुम्हें बिल्कुल परेशान नहीं करूंगा। बस चुपचाप तुम्हें छू कर हौले से गुज़रता जाऊंगा और तुम मुझमें खो कर ख़ुद को ढूंढ लेना। वापस तो तुम्हें लौटना ही है।फ़िर से। उसी सांसारिक जीवन में। जहाँ हज़ार उतार चढ़ाव होते हैं। पर सुनो, मेरे एहसास की गरमाहट को अपने साथ ले जाना। उलझनों,उम्मीदों और जीवन के हर उतार चढ़ाव में ये एहसास तुम्हें बांध कर रखेंगे। तुम्हें कभी टूटने नहीं देंगे। जब-जब बिखरोगी तुम्हें उसी अपनेपन से समेट लेंगे जिस अपनेपन से मैं तुम्हारा न होकर भी तुम्हारी आत्मा को चुपचाप छू कर गुज़रता जाऊंगा। बिना तुम्हें परेशान किये। बिना तुमसे कोई शिकायत किये। बिना तुमसे कोई उम्मीद रखे।

मैं निःशब्द खड़ी उन्हें अपनी आँखों के इतने क़रीब से गुज़रता हुआ देख रही थी। मेरे पास सिर्फ़ मेरा शरीर बच गया था। आत्मा तो अनंत गहरी ख़ामोश वादियों में हमेशा के लिए खो जाने के लिए बादलों के संग जा चुकी थी। हाँ जाते-जाते भी मेरे शरीर में चेतना छोड़ गयी थी जिससे मैं प्रकृति की इस दैवीय ख़बसूरती को महसूस कर सकूँ और हमेशा के लिए उन्हें अपने ज़हन में कैद कर सकूँ। इस दृश्य को अपनी आँखों के सामने देख कर मुझे पहली बार एहसास हुआ कि सच में जीवन के कुछ खूबसूरत पहलुओं को जीने के लिए रिस्क लेना पड़ता है। बिना रिस्क लिए सच में पता नहीं चलता कि लिया गया फैसला सही है या ग़लत। पहाड़ों का श्रृंगार सिर्फ बर्फ़ की रूमानी चादर से नहीं होता है।पहाड़ के और भी बहुत से ख़ूबसूरत अनकहे अनदेखे पहलु होते हैं जिन्हे देखने के लिए मेरा ये रिस्क लेने का फ़ैसला बिल्कुल सही साबित हुआ था। मेरी आँखों के सामने धरती नही, परीलोक था। 

एक बंगाली कविता के अनुसार बादलों को पहाड़ों का पोस्टमैन कहा जाता है। उस बालकनी की खिड़की से मैं जहाँ तक देख पा रही थी आँखों में सामने क्षितिज तक सिर्फ बादल और पहाड़ दिख रहे थे। दूर बहुत दूर जहाँ तक़ आँखें देख सकती थीं बस दोनों एक दूसरे में समाए हुए दिखाई दे रहे थे। न बादलों का आरंभ दिख रहा था और न पहाड़ों का अंत। दोनों हर वक़्त न जाने एक दूसरे से क्या बातें कर रहे थे । वो आता है और पहाड़ों के कानों में हौले से कुछ कहते हुए अपनी यात्रा पर आगे निकल जाता था। जिस नज़र से मैं बादलों को देख रही थी, वो पहाड़ों का डाकिया नहीं था। उन दोनों में एक बहुत गहरा और निश्छल स्वार्थ रहित रिश्ता था। दोनों अपने अपने कर्म पथ पर खड़े, एक दूसरे के न होकर भी एक दूसरे के बैगेर अधूरे थे। दोनों की राहें अलग थीं, मंज़िल भी अलग थे पर दोनों में एक दूसरे की आत्मा पूरी तरफ घुल चुकी थी। दोनों को एक दूसरे से कोई उम्मीद, कोई गिला सिकवा नहीं था। न कुछ पाने की इच्छा न कुछ छीन जाने का डर। बस था तो निस्वार्थ प्रेम। एक दूसरे को पूरा करने का समर्पण। यहाँ तय कर पाना मुश्किल था कि कौन किसका कृष्ण है और कौन किसकी मीरा। 

होटल के रेस्टोरेंट से ब्रेकफास्ट तैयार हो जाने का कॉल आया तब जाकर याद आया कि आज हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टिट्यूट, चिड़ियाघर, तिब्बतियन रेफ्यूजी सेल्फ़ हेल्प कैंप और सबसे ख़ास जगह टी गार्डन घूमने का प्लान था। फटाफट तैयार होकर हम नास्ता करने के लिए रेस्टोरेंट की और भागे क्यूंकि गाड़ी पकड़ने के लिए होटल से कुछ दूर चलकर जाना था। 

दार्जीलिंग का हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टिट्यूट देश के विभिन्न जाने माने माउंटेनियरिंग संस्थानों मे से एक है। इसकी स्थापना पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 4 नवंबर 1954 को की थी। माउंटेनियरिंग क्षेत्र के कई जाने माने हस्तियों का नाम इस संस्थान से जुड़ा हुआ है। तेनज़िंग नॉर्वे 1954 से लेकर 1976 तक इस संस्थान के फिल्ड ट्रैंनिंग विभाग के डायरेक्टर के पद पर कार्यरत रहे थे। 1976 में उनकी नियुक्ति एडवाइजर के तौर पर की गयी थी और मई 1986 (अपने अंतिम दिनों तक) तक वो इस संस्थान से जुड़े रहे थे। नवाम्ब गोम्बु (पहले व्यक्ति जो माउंट एवेरस्ट पर दो बार चढ़े ) और दोरजी लहाटू भी इस संस्थान से जुड़े हुए थे। हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टिट्यूट में माउंटेनियरिंग सम्बंधित बहुत से कोर्स कराये जाते हैं जिसकी विस्तृत जानकारी  इस संस्थान के वेबसाइट पर मौजूद है। यहाँ लगभग 15 मिनट का शो में पर्वतारोहियों की कहानियां और उनके ट्रेकिंग अभियान का विडिओ दिखाया जाता है।15 मिनट तक मुझे कुछ भी एहसास नहीं था कि उस कमरे में मेरे अलावा बाकी लोग भी बैठे हुए थे। पर्वतारोहियों के हिम्मत और ज़ज़्बे को देखकर दिल में एक ख्वाहिश जगी कि जीवन में एक बार तो इस तरह के लम्हों को ज़रूर जीना चाहिए। जीवन में इस तरह के काम करने के लिए  ख़ुद को एक मौका ज़रूर देना चाहिए। भले छोटे स्तर पर दें, पर देना ज़रूर चाहिए। मुझे नही मालूम कि ये ख्वाहिश कोई साकार रूप लेगी या नहीं और अगर लेगी तो कब लेगी। पर कहते हैं न कि कुछ सपनों को हकीकत में बदलने के लिए पहले उन्हें देखना ज़रूरी होता है। हमें सपने देखते रहना चाहिए। क्यूंकि तभी जीवन में इस बात का एहसास होता है कि कौन सा समय किस सपने को पूरा करने के लिए सबसे उपयुक्त है और इस तरह हम अपने सारे सपनों को पुरे कर पाते हैं । अगर हम सपना ही नहीं देखेंगे और उन्हें पूरा करने की कोशिश ही नहीं करेंगे तो फ़िर कैसे जान पाएंगे कि हमारी ज़िन्दगी हमसे कितनी उम्मीदें लगाए बैठी होती है।

हिमालयन माउंटनियरिंग इंस्टिट्यूट और चिड़ियाघर दोनों एक ही कैंपस के अंदर हैं। यहाँ के बाद हमारा अगला डेस्टिनेशन था तिबतियन रिफ्यूजी हेल्प सेंटर। हिमालय की वादियों में इस रिफ्यूजी कैंप की स्थापना २ अक्टूबर 1959 को  तब की गयी थी जब तिब्बत से कुछ रिफ्यूजी दलाई लामा के साथ भारत आ गए थे। इस कैंप की सबसे मुख्य विशेषता है यहाँ के लोगों द्वारा बनाये गए हेंडीक्राफ्ट। यहाँ आपको कपड़े से लेकर अगरबत्ती तक  सब कुछ हाथ के बनाये हुए मिलेंगे। तिब्बत के लोगों के लिए ये जगह इसलिए भी ख़ास है क्यूंकि जब चीन ने तिब्बत पर चढ़ाई की थी तब 1910 से लेकर 1912 तक तेरहवें दलाई लामा ने अपने देश निष्कासन का समय भारत में ही गुज़ारा था। चार लोगों से शुरू हुए इस कैंप में आज लगभग 130 परिवार रहते हैं। दरसल वो पूरा कैंप की एक परिवार है। कैंप के बुजुर्ग लोगों की बूढ़ी हो चुकी आँखों में सालों पहले परिवार  से बिछुड़ जाने का दर्द आज भी हरा है। मैं महसूस कर पायी थी, उनकी आँखों में बिछड़ चुके अपनों से वापस मिलने की  उम्मीद तो नहीं थी,पर हाँ जब मैंने कुछ लोगों से उनके परिवार के विषय में पुछा तो उनकी आँखों में दूर देश में बसे अपने परिजनों के लिए (जिनका शायद वो नाम भी नहीं जानते होंगे ) दुआएं ज़रूर देख पायी थी। उन आँखों में अगर कुछ जीवित था तो सिर्फ उनका बिता हुआ कल जिसमें उन्होंने अपने परिवार के साथ अपने देश में बेहद खूबसूरत पल बिताये थे। वो यादें धुंधली होकर भी जीवन से भरी हुई थीं।

पराये देश ने पनाह तो दे दी थी और उन्होंने इस पराये देश को दिल से अपना भी बना लिया था,पर जब हमेशा के लिए अपना देश छूटता है तो सिर्फ आशियाना ही नहीं बिखरता। पूरी ज़िन्दगी और सारे सपने भी बिखर जाते हैं। वो बूढ़ी आँखें आज भी अपने बिखरे हुए जीवन को काम करके समेटने में ही लगी हुई थीं।पर एक चीज़ जो वहां सबसे ख़ास थी वो ये कि परायेपन का एहसास न उनके अंदर था  और न उनसे मिल कर मुझे हुआ था। उस जगह की हवाओं में बुद्ध की पूजा में प्रयोग किये जाने वाले हाथ से बने अगरबत्तियों की खुशबू फैली हुई थी। बीच में एक बहुत बड़ी खुली जगह और चारों तरफ से दुकानें कारख़ाने और रहने के लिए छोटे-छोटे कमरे बने हुए थे- बिल्कुल गाँव के घर की तरह। ऐसा लग रहा था जैसे अपने गाँव में बिताया मेरा बचपन मेरी आँखों के सामने उस बड़ी सी आंगननुमा जगह में खेल रहा था।

बादल घिरने शुरू हो गए थे और जिस जगह को बचपन से बिल्कुल क़रीब  से देखने की आस लगाए बैठी थी, बारिश की वजह से उसे देखने से चूकना नहीं चाहती थी। इसलिए इसके पहले कि बारिश पूरे शहर को अपनी आगोश में ले ले हम टी गार्डन देखने के लिए निकल गए।

अब मेरी ज़िन्दगी का सबसे पहला सपना साकार रूप में बादलों के बीच खिला हुआ दिख रहा था मेरे लिए बचपन में पहाड़ों का मतलब टी गार्डन ही रहा ।बचपन में मुझे लगता था की दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत जगह यही है। वैसे तो प्रकृति की ख़बसूरती को किसी मापदंड में नहीं बाँधा जा सकता,न जाने कब वो अपने किस सुन्दर और दैवीय रूप से आपको रूबरू करवा दे, लेकिन दूर बहुत दूर तक पहाड़ों के ढ़ालाओं पर बसे उन चाय के बागानों की ख़ूबसूरती ही कुछ अलग थी। ऐसा लग रहा था जैसे वो घाटी घर का बुजुर्ग सदस्य था और छोटे छोटे पत्तों वाले चाय के पौधे  उसकी गोद में खेलते बच्चे। सड़क के किनारे खड़ी मैं, आँखों के सामने घाटी में फैले चाय के बागान और ऊपर आसमान में धुएं सा बहता बादल – ये दृश्य बिल्कुल वैसे ही था जैसे बरसों से कोई प्रेमिका अपने प्रेमी के वापस लौटने का इंतज़ार कर रही हो।और जब उसका प्रेमी बरसों बाद उसकी आँखों के सामने आये,तो वो बस अपने प्रेमी को दूर से देखते हुए ही प्राण त्याग देना चाहे।जैसे उसे डर हो कि अपने प्रेमी के बरसों दूर होने की जिस सच्चाई को वो यथार्थ मान चुकी है, कहीं उसके आँखों के सामने उसका प्रेमी कल्पना के रूप में न खड़ा हो, जो छूते ही आँखों के सामने से ओझल हो जाए। मैं उस वक़्त भी उस दृश्य को देखकर कुछ नहीं बोल पायी थी और लिखते वक़्त भी मेरे पास शब्द नहीं हैं। मैं बस कुछ तस्वीरें खिंच पायी थी।

यात्राओं के दौरान मुझे हड़बड़ी बिल्कुल नहीं पसंद।दार्जीलिंग के आस पास एक दो जगहें और भी थीं जहाँ घूमने जाया सकता था। पर मेरे पास सिर्फ़ तीन दिन थे और मैं उन तीन दिनों में सिर्फ और सिर्फ़ इसी शहर को जीना चाहती थी। और मैंने भरपूर जिया भी। हर एक एहसास और हर एक स्मृति मेरे अंदर आज भी बिल्कुल वैसे ही ताज़ी है, जैसे तब थी जब मैंने पहली बार ख़ुद को  बादलों के बीच से गुज़रता हुआ महसूस किया था। ये मेरे जीवन का पहला अनुभव था और जीवन के सारे पहले अनुभव चाहे वो मीठे हों या कड़वे,ज़िन्दगी भर याद रहते हैं।

अगले दिन वापस कोलकाता आना था। मैंने उस दिन शाम को मॉल मार्केट से कुछ फेंग शुई की चीजें लीं और जल्दी होटल आ गयी क्यूंकि अगले दिन के लिए पैकिंग करनी थी। मैं खुश थी। मुझे वहाँ से जाने का कोई गम नहीं था क्यूंकि मैं उस शहर की खूबसूरती को जितना अपने ज़हन के कैनवास पर उतार सकती थी मैंने उतार लिया था। ज़िन्दगी भर के लिए।उन तीन दिनों में मैंने अपने दिल के सारे दरवाज़े  खोल दिए थे और दिमाग को पूरी तरह आराम करने के लिए कह दिया था।उन दो दिनों में मेरा दिल सब कुछ महसूस करने के लिए खुले आसमान के परिंदे की तरह आज़ाद था। दिल और दिमाग जुदा सोच कर भी हमेशा साथ रहते हैं। किसी एक की सुन कर ज़िन्दगी को न जिया सकता है न समझा। पर कई बार ख़ुद को समझने के लिए दिल और दिमाग के बीच की दूरी बढ़ानी पड़ती है। और मुझे लगता है कि यात्राओं के दौरान इस दूरी को थोड़ा ज़्यादा बढ़ा देना चाहिए। सारे उलझनों को इंतज़ार करने के लिए कहकर दिमाग को सोचने समझने की जीम्मेदारी से छुट्टी दे देनी चाहिये।

अगले दिन सुबह से ही बहुत तेज़ बारिश हो रही थी। जैसे शहर भी मुझसे जुदा नहीं होना चाहता था, जैसे मैं उससे नहीं होना चाहती थी। पर ज़िन्दगी एक शहर में कहाँ कटती है। ज़िन्दगी भर हमारे साथ शहरों का कारवां चलते रहता है। वो शहर भी हमेशा के लिए छूट जाता है जहाँ से हमारे अस्तित्व की शुरुवात हुई होती है। हम बस इतना ही कर सकते हैं कि जिस भी शहर में रहें उससे इतना प्यार करें कि वो शहर हमारी आत्मा में बस जाए और हम उसकी आत्मा में। उन तीन दिनों में मैंने दार्जीलिंग को पूरी तरह अपनी आत्मा में बसा लिया था और अपना एक हिस्सा हमेशा के लिए वहां की हवाओं,बादलों और पहाड़ों को सौंप दिया था। मुझे लगता है कि प्रकृति की गोद में अपनी आत्मा के एक हिस्से को हेमशा के लिए छोड़ आना ही मेरे बचे हुए अस्तित्व को सुरक्षित रख सकता है।मैंने वहां के मार्केट से एक कप ख़रीदा था जिसपर लिखा है i love darjeeling और उसपर चारों तरफ़ पहाड़ों से घिरी घाटी की बहुत ख़ूबसूरत तस्वीर है। वो कप आज भी मेरे स्टडी टेबल पर रखा है। मैं उसमे कुछ भी नहीं पीती, इसी डर से की कहीं टूट न जाए। कहीं उसका रंग फीका न पड़  जाए। कुछ यादें जीने के लिए नहीं, सिर्फ़ संजोने के लिए होती हैं।

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