दिल्ली डायरी

हे IRCTC ! ट्रेन का टिकिट मांगा है, लोकसभा का नहीं

 ये असम्भव सा काम आज बस होने ही वाला था। जिस काम के लिये पिछले हफते भर से तरह तरह के जुगाड़ काम ना आये उस काम को आज मैं घर बैठे कर ही लेने वाला था। उम्मीद पूरी थी। बावजूद इसके कि पुराने अनुभव इस पूरी उम्मीद का समर्थन करने वाले तो कतई नहीं थे। पर हम तो ठहरे उम्मीद पालने में माहिर। घोर आशावादी किसम के मासूम से इन्सान। इस बात पर भरोसा करने वाले कि अच्छे काम ‘तत्काल’ हो जाया करते हैं, ठीक वैसे जैसे आज ये दिल्ली से मुम्बई का ये टिकिट होने वाला था। घर बैठे। तत्काल। भारतीय रेलवे की इस महान सुविधा के ज़रिये। मन ने एक बार चेताया भी-“वाह आशावाद की भी हद होती है। धैर्य की पराकाष्ठा की भी एक सीमा होती है दोस्त।” पर हमें कौन समझाये ?

खैर सुबह उम्मीदों की पोटली बांधे, चाय का कप में हाथ में लिये, 9 बजकर ठीक 30 मिनट पर हम अपने लैपटाॅप को अपनी लैप के पास धरे एड्रेस बार में टाइप कर चुके थे। डब्लू डब्लू डब्लू डाॅट आईआरसीटीसी डाॅट काॅम। और वाह तुरन्त, जी हां, बिल्कुल तुरंत वैबसाइट खुल भी गई। आज सुबह अच्छी जाने वाली थी। हमें यकीन हो चुका था। अपना आइडी, पासवर्ड (जो उंगलियों ने इतना टाइप किया है कि अब उंगलियां मशीनी रफ्तार में चलती हैं) डाला। वाह बुकिंग वाला पेज भी सटासट फटाफट चटाचट खुल गया।

फ्रोम-एनडीएलएस, टु-बीसीटी टाइप किया।बिना नागा किये अगला पेज कुछ ही सेकंडों में आखों के सामने था। आज का दिन कुछ असाधारण था। आइआरसीटीसी अपने एक्टिव मोड में थी।

तो अब किसी तरह अगले 30 मिनट हमें इस वैबसाइट पर गुजारने थे ताकि जैसे ही 10 बजे हम बुक नाव पर क्लिक करें और बुक नाव की नाव हमें खेते हुए उस शुभ सन्देश की ओर ले जाय जहां लिखा हो सक्सस। यूर टिकिट इज़ डन। डनडनाडन। तो हम लगातार वैबसाइट पर बने रहे। कभी राजधानी तो कभी दुरन्तो, कभी गरीब रथ तो कभी अगस्त क्रान्ति और तो और कुलक्षिणी देहरादून एक्सप्रेस पर भी हमने कई बार क्लिक किया ताकि हमारे लाॅगिन सैशन को निरस्त ना कर दिया जाये। खैर पूरे 20 मिनट हम सफलता पूर्वक गुजार चुके कि तभी दिल तोड़ने वाला एक सन्देश आया। भैया जी आपका लाॅग इन सैशन टाइम आउट होता है। आउच। यही तो हम नहीं चाहते थे। इसीलिये तो वैबसाइट पर इतनी दफा उंगली कर रहे थे। खैर इस बार ज़रा संशय के साथ पर फटाफट हमने वापस लाॅगिन किया। और ये क्या इस बार भी तुरन्त सफलता मिल गई। आज तो दिन था हमारा। अब हमें दिल्ली से मुम्बइ जाने से दुनिया की कोई जी हां कोई ताकत नहीं रोक सकती। हम मान चुके थे कि आने का जो वादा हमने कित्ते सारे लोगों को किया है वो चाहे रोके ज़माना या रोके खुदाई हम निभा ही लेंगे। और भारतीय रेलवे की ये साइट तो आज रोकने के मूड में लग ही नहीं रही थी।

जैसे ही दस बजा दिल की धड़कनों की रफ्तार भारतीय रेलवे की रफ्तार से भी कई गुना ज्यादा बढ़ गई। देश के लाखों लोगों और कुछ हज़ारों दलालों में से कौन होगा वो सबसे भाग्यशाली जिसे मिलेगी आइआरसीटीसी की तत्काल की टिकिट ? कौन बनेगा तत्काल टिकिट पति का खेल ज़ारी था और हम इस वक्त हाॅट सीट पे बैठे बुक नाव पे क्लिक कर चुके थे। अपना नाम, उम्र, आई डी, बर्थ प्रिफरेंस, फूड प्रिफरेंस सब चीते की रफ्तार से टाइप कर चुके थे। आज वो कुरुप सा दिखने वाला कोड भी हमें एक बार में साफ नज़र आ चुका था। ‘नेक्स्ट’ वाले टैब पर क्लिक करके हम ट्रांजेक्शन वाले पेज पे पहुंच चुके थे। सबकुछ मिशन के हिसाब से एकदम सही चल रहा था। पुरानी बोलिवुडिया जासूसी फिल्मों की तरह एकदम ‘पिलान के मुताबिक’।

बस यहां ज़रा सी रुकावट हुई। शायद आधा मिनट। हमारे बैंक की ओर से डेबिट कार्ड से ट्रांजेक्शन करने की सुविधा हमें इस वैबसाइट पर नहीं मिल रही थी। तो हमने नेटबैंकिंग पासवर्ड याद करने की कोशिश की। झट से याद आया,  फट से टाइप किया। बैंक में लाॅगइन किया। पैसे बैंक से ले लेने की अनुमति वैबसाइट को दी। और तुरंत हमारे मोबाइल पे मैसेज आ गया कि आपके अकाउंट से पैसे लिये जा चुके हैं। पर यहां वेबसाईट पर तुरंत एक और मैसेज आया कि भैया वो सब तो ठीक है, पैसे हमने ले लिये हैं, पर सीट उपलब्ध ना होने की वजह से आपका ट्राजैक्शन फेल होता है।

मतलब आधे मिनट में 300 से ज्यादा सीट सफाचट हो गई ? इतना तत्काल ? और वो भी तब जबकि ठीक 10 बजकर चंद सेकंडों में हम सीट पर अपना दावा ठोक चुके थे ? कोई हमें बताये कि ये कैसे सम्भव है ? सबकुछ वक्त पे करने के बाद आप हमसे पैसे भी झड़ा लें और टिकिट भी ना दें ? मतलब हमें दलालों को बिना 5-6 सौ रुपये ज्यादा दिये आप टिकिट उपलब्ध नहीं करा पाएंगे ? तो एक काम कीजिये ना कि ये सुविधा बस दलालों के लिये खुली रहने दीजिये हम उनसे ही टिकिट करा लिया करेंगे। काहे खालीपीली हमारे धैर्य का इम्तेहान लेते हैं, झूठी दिलासा देते हैं, हमारा वक्त खराब करते हैं ? सुविधा शब्द को काहे इतना अपमानित करते हैं ? तत्काल के मायने काहे बिगाड़ते हैं ? हमारी आशाओं को काहे रोज उस ट्रेन के नीचे कुचलते हैं जिसका हम इन्तज़ार करते रह जाते हैं, लेकिन सुसरी कभी आती ही नहीं। आपके बस का नहीं है तो बता दीजिये ना हम आदिकाल को याद करके पैदल-पैदल निकल जाएंगे अपनी अपनी यात्राओं में। जितने दिन आपकी इस वैबसाइट से टिकिट करवाने में खर्च होते हैं उतने दिन में तो हम अपने पांवों के भरोसे रहकर भी पहुंच ही जाएंगे जी।

हे लौहपथ गामिनी यात्रा पत्रक पूर्ववरण प्रदायिणी सेवा तुम भी माया की तरह ठगिनी मत बनो। तुमसे कोई लोकसभा का टिकिट तो मांग नहीं रहे। दिल्ली से मुंबई थर्ड एसी के टिकिट के लिए क्यूं हमारी ऐसी की तैसी कराने पर तुली हो ? हफ्ते भर से एस्पाईरिंग पेसेंजर का बोझ लादे हम दो शहरों के बीच अटके हुए हैं। देखो अभी-अभी तुम्हारी इस आभासी खिड़की से कूदकर हमारी एक उम्मीद ने आज फिर से आत्महत्या कर ली है।

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उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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