अरुणाचल प्रदेश यात्रा : बोमडिला से तवांग वाया सेला पास

यह लेख मूलतः  ‘दैनिक जागरण’ के लिए लिखा गया था जो अख़बार के ‘सप्तरंग’ पन्ने पर प्रकाशित हो चुका है. 
 
 
पूर्वोत्तर के शांत पहाड़ों की ख़ामोशी को महसूस करना हो तो बोमडिला एक बेहतरीन ठिकाना है। सूर्योदय के प्रदेश कहे जाने वाले अरुणांचल प्रदेश के वेस्ट कामेंग जिले का मुख्यालय है बोमडिला। ला दरअसल स्थानीय भाषा में दर्रे को कहा जाता है। बोमडिला दर्रा भारत को डिब्बत के ल्हासा से जोड़ता है। यहां की चोटियों से भूटान को जाती हुई सड़कें भी दिखाई देती हैं। चीन और भारत के बीच यह इलाक़ा लम्बे समय तक विवाद का विषय भी बना रहा है। 
 
असम के तेजपुर से बोमडिला के लिए शेयरिंग टैक्सी मिल जाती है. क़रीब 150 किलोमीटर की इस यात्रा के लिए आमतौर पर टाटा सूमो मिलते हैं, जिनकी बुकिंग तेजपुर में जगह-जगह बने काउंटर्स पर की जा सकती है. पांच घंटे के इस खूबसूरत पहाड़ी सफ़र के बाद आप पहुंचते हैं दूर बनी बुद्ध की धरती पर. 
 
           
 
समुद्रतल से 2217 मीटर की ऊंचाई पर बसा बोमडिला न केवल अपने क़ुदरती सौंदर्य के लिए पर्यटकों को लुभाता है बल्कि चीन की सीमा से अपनी नज़दीकी की वजह से भी यह पूर्वोत्तर के महत्वपूर्ण इलाकों में शुमार हो जाता है। सुदूर पर्वतों की चोटियों के बीच घिरा गौतम बुद्ध के अनुयायियों का ये छोटा शहर उनके ही जीवन मूल्यों की तरह शांत भी है और अलग-अलग जनजातियों से जुड़े यहां के लोगों की तर्बियत में भी वो शांति सहज ही दिख जाती है। मोंपा, मिजी, आका, बेगुन या शेरडुकपेन जनजातियों की रिहाइश वाले बोमडिला में तिब्बती संस्कृति का प्रभाव साफ़ नज़र आता है। वहीं यहां के बाज़ार में टहलते नौजवान लड़के-लड़कियों को देखकर साफ़ पता चलता है कि फ़ैशन के मामले में वो देश के बड़े महानगरों से एकदम पीछे नहीं हैं। सेव के बाग़ानों और ऑर्किड की महक के साथ लोसर जैसे उत्सवों की धूम बोमडिला आने के अहसास को कुछ ख़ास बना देती है।  
 
बोमडिला जाते हुए हिमालय की चोटियों के नज़ारे
 
 
तेज़पुर से बोमडिला पहुंचाने वाली सड़क दुर्गम भूगोल की वजह से बीच-बीच में टूटी-फूटी ज़रूर है लेकिन ये सड़क जब आपको अपनी मंज़िल तक पहुँचाती है तो रास्तों की मुश्किलें फिर मायने नहीं रखती। बर्फ़ पहने ख़ूबसूरत पहाड़ बोमडिला जाने के रास्ते भर में आपके हमसफ़र बने रहते हैं। बोमडिला पहुंचकर अरुणांचल प्रदेश की सबसे ऊंची चोटियां केंगटो और गोराइचेन आपको एकदम सामने नज़र आती हैं, जैसे इस पर्वतीय प्रदेश में आने पर अपनी उजली मुस्कुराहट के साथ वो आपका स्वागत कर रही हों।
 
कहा जाता है कि मध्यकाल में बोमडिला तिब्बत के साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। कुछ साक्ष्य इस बात के भी हैं कि यहां पर भूटान की जनजातियों का भी शाषन रहा है। 1962 के भारत-चीन युद्ध में चीन  की सेना ने बोमडिला पर क़ब्ज़ा कर लिया था लेकिन बाद में उन्हें वापस लौटना पड़ा। शहर के कोलाहल से छुट्टी लेकर कुछ दिन इत्मिनान की दुनिया में बिताना चाहते हों तो आपके लिए बोमडिला एकदम मुफ़ीद ठिकाना है।
 

तीन गोंपा जो हैं आस्था के प्रतीक 

 
बोमडिला बुद्ध के अनुयाइयों की आस्था का एक अहम केंद्र है। यहां मौजूद 3 गोम्पा बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों के लिए तो ख़ास अहमियत रखते ही हैं, देशभर से आने वाले पर्यटकों को भी ये अपनी ख़ास शिल्पकला की वजह से अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
 

ऊपरी गोम्पा

 
बोमडिला के मुख्य बाज़ार से क़रीब 5 किलोमीटर की दूरी पर बना ऊपरी गोंपा 15 वीं शताब्दी में बनी दक्षिणी तिब्बत की त्सोना गोंट्से मोनेस्ट्री की नकल है। इस गोंपा के निर्माण की शुरुआत 12वें रिंपोचे के दौर में 1965-66 में हुई। यहां बुद्ध के मंदिर के साथ-साथ एक बड़ा प्रार्थना कक्ष और बौद्ध सन्यासियों के रहने के लिए कमरे भी बने भी हैं। इस गोंपा की ख़ास बात ये है कि यहां से बोमडिला का सुंदर नज़ारा भी देखने को मिलता है।    
 

मध्य गोम्पा 

 
बोमडिला के बीचों-बीच बना गोंपा
 
खड़ी चढ़ाई चढ़ने के बाद आप बोमडिला के सबसे पुराने गोम्पा यानी मध्य गोम्पा में पहुँचते हैं। मुख्य बाज़ार से क़रीब 2 किलोमीटर चलने के बाद जब आप पहाड़ की चोटी पर बने इस गोम्पा के अहाते में पहुँचते हैं तो यहां का नज़ारा देखकर सारी थकान मिट जाती है। इस गोम्पा में गौतम बुद्ध के अलग-अलग अवतारों की तस्वीरें भी लगी हैं। मान्यता है कि यहां आकर पूजा अर्चना करने से भगवान बुद्ध सारी बीमारियां हर लेते हैं।
 

निचला गोम्पा 

इसे थूबचोंग गेटसेल लिंग मोनेस्ट्री भी कहा जाता है। बाज़ार के बीचों-बीच बने इस गोम्पा में भी एक बड़ा प्रार्थना कक्ष है। बोमडिला के टेक्सी स्टेंड के दूसरी ओर मौजूद इस गोम्पा के आहाते में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।
 
तवांग के बौद्ध मठ के लिए जाते हमारे सहयात्री बच्चे
 

टिपी ऑर्किड रिसर्च सेंटर

ऑर्किड के फूलों की रंगत देखनी हो तो टिपी ऑर्किड रिसर्च सेंटर ज़रूर जाना चाहिए। 10 हेक्टेयर में फैले इस सेंटर में ऑर्किड की तमाम वेराइटी मौजूद हैं। क़रीब 1000 प्रजातियों के फूलों वाला ऑर्किड ग्लास हाउस इस सेंटर का एक अहम हिस्सा है। इस ग्लास हाउस के बीच में एक झील बनाई गई है जिसपर एक फ़व्वारा भी है। अलग-अलग तरह के क़रीब 10 हज़ार ऑर्किड के पौधे इस ग्लास हाउस में अपनी छटा बिखेरते हैं। इस सेंटर में प्रयोगशाला, म्यूज़ियम और बग़ीचे भी बनाए गए हैं। ख़ुशबुओं और फूलों से प्यार करने वाले पर्यटकों का तो इस सेंटर में एक बार ज़रूर जाना बनता है। 
 

ईगलनेस्ट वाइल्डलाइफ़ सेंचुरी 

बोमडिला से क़रीब 50 किलोमीटर की दूर घने जंगल के बीच है ईगलनेस्ट वाइल्डलाइफ़ सेंचुरी। 2018 वर्ग किलोमीटर में फैली ये सेंचुरी कई दुर्लभ पक्षियों का घर है।इस सेंचुरी में उभयचर प्राणियों की 34, सांपों की 24, पक्षियों की 454 और तितलियों की 165 प्रजातियां पाई जाती हैं। हाथी, लंगूर, बंगाल टाइगर, रेड पांडा, भालू जैसे वन्य जीव भी इस सेंचुरी में देखे जा सकते हैं।भारतीय सेना की रेड ईगल डिविज़न सन 1950 में यहां हुआ करती थी जिसके नाम पर इस सेंचुरी का नाम ईगलनेस्ट पड़ा। जैव-विविधता के लिहाज़ से ये देश के सबसे ज़्यादा संरक्षित अभयारण्यों में शुमार है। बर्ड वाचिंग और फ़ोटोग्राफ़ी के शौकीन लोगों के लिए ये सेंचुरी किसी ख़ज़ाने से कम नहीं है। 
 
ख़ूबसूरत टेंगा नदी

रूपा वैली और  चिलीपम 

बोमडिला आते हुए रास्ते में एक सड़क टेंगा नदी के किनारे बसी रूपा वैली के लिए कट जाती है। भारतीय सेना की छावनियों के बीच से गुज़रते हुए जब आप इस घाटी में पहुँचते हैं तो अद्भुत शांति का अहसास होता है। पहाड़ों के बीच बसे इस छोटे से क़स्बे को आप पैदल ही नाप सकते हैं। यहां क़रीब 100 साल पुराना एक गोम्पा भी है जो तिब्बत की पारम्परिक बौद्ध शिल्पकला का अद्भुत नमूना है। लकड़ी पर की गई जंतुओं और पौधों के चित्रों की नक्काशी के साथ ही रंगों का अनूठा समन्वय भी इस गोम्पा के शिल्प को ख़ास बना देता है। यहां से एक सड़क पहाड़ की चोटी पर बने चिलीपम गोम्पा की तरफ़ ले जाती है। चिलीपम से रूपा वैली का ख़ूबसूरत नज़ारा भी देखने को मिलता है।
 

दीरांग वैली 

बोमडिला से तवांग जाने के रास्ते में क़रीब 43 किलोमीटर दूर है एक ख़ूबसूरत वैली-दीरांग।कामेंग नदी के किनारे पहाड़ों की तलहटी पर बसा ये क़स्बा बेहद ख़ूबसूरत तो है ही साथ ही समेटे है सालों पुरानी स्थापत्य कला की विरासत भी। यहां दीरांग डजोंग नाम का इलाका 150 साल पुराना है। डजोंग के आस-पास बने पत्थर के कुछ घर क़रीब 500 साल पुराने हैं। यहां से क़रीब 1 किलोमीटर आगे गरम पानी का एक सोता भी है जिसे स्थानीय लोग बहुत पवित्र मानते हैं। इस सोते में आप चाहें तो डुबकी भी लगा सकते हैं। दीरांग के पास देश का अनूठा राष्ट्रीय याक अनुसंधान केंद्र भी है। 1989 में शुरू हुए इस रिसर्च सेंटर में याक से जुड़े विभिन्न पहलुओं मसलन उत्पादन, ब्रीडिंग, नस्लों में सुधार आदि पर अनुसंधान किया जाता है। यहां से 31 किलोमीटर दूर एक याक फ़ार्म भी बनाया गया है। रिसर्च सेंटर देखने के लिए आपको पहले से अनुमति लेनी ज़रूरी है।
 
 

सेला – मार्मिक कहानी और एक ख़ूबसूरत दर्रा 

 
समुद्र तल से क़रीब 4170 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद सेला चीन की सीमा से लगे तवांग को बोमडिला और देश के बाक़ी हिस्सों से जोड़ता है। सेला लगभग सालभर बर्फ़ से घिरा रहता है और चारों ओर चौधयाती बर्फ़ के बीच सेला लेक की ख़ूबसूरती देखने लायक होती है। यह झील तिब्बत के बौद्ध धर्म में पवित्र मानी जाने वाली 101 झीलों में से एक है। उजली बर्फ़ से घिरी ये गहरी नीली झील इतनी ख़ूबसूरत लगती है कि सैलानियों ने इसे ‘पैराडाइस लेक’ नाम दे दिया है। इस इलाक़े में साल-भर बर्फ़ पड़ती है इसलिए बॉर्डर रोड ऑर्गर्गनाइज़ेशन यहां हमेशा चौकसी बनाए रखता है ताकि सड़क मार्ग में रुकावट न आने पाए। सर्दियों में यहां का तापमान -10 तक चला जाता है और सेला लेक फ़्रीज़ हो जाती है। 
 
क़रीब 13 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर सेला झील
 
सेला के नामकरण के पीछे एक कहानी भी छिपी है। क़िस्सा कुछ यूं है कि भारत चीन युद्ध के दौरान चीन की सीमा तवांग से आगे बढ़ चुकी थी। सेला के पास तैनात जसवंत सिंह रावत नाम का एक वीर सिपाही सेना से अकेला लोहा ले रहा था। उसकी वीरता को देखकर एक आदिवासी महिला सेला बहुत प्रभावित हुई और उसके लिए खाना और पानी लेकर आई। अकेले दुश्मन से लोहा लेता हुआ ये सिपाही आख़िरकार वीरगति को प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि उसकी लाश को जब सेला ने देखा तो दुखी होकर उसने आत्महत्या कर ली। जसवंत सिंह की वीरता और शहादत को याद करने के लिए यहां एक स्मारक भी बनाया गया है।
 
 

चीन की सीमा के पास तवांग 

सेला के वीरान बर्फ़ीली ढलान भरी सड़क से गुज़रते हुए क़रीब 67 किलोमीटर के सफ़र के बाद आप तवांग पहुंचते हैं. चीन की सीमा के नज़दीक बना यहां शांत पहाड़ी क़स्बा हिमालय की पहाड़ियों से घिरा है. दूर से ही बुद्ध की विशाल प्रतिमा आपको अपनी ओर आकर्षित करती है. तवांग शहर का मुख्य आकर्षण है यहां मौजूद भारत का सबसे बड़ा बौद्ध मठ यानी तवांग मोनेस्ट्री. यह दुनिया की दूसरा सबसे बड़ा बौद्ध मठ भी है. भारत के सबसे दूरस्थ इलाकों में से एक तवांग में मौजूद यह मठ बौद्ध धर्म के अनुयायियों के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है. तवांग से 37 किलोमीटर आगे है यहां का सबसे सीमांत इलाका बुमला जो क़रीब 15 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर है. बुमला के बाद चीन की सीमा शुरू हो जाती है.
तवांग शहर और शहर के बीच बुद्ध की प्रतिमा जो दूर से ही आकर्षित करती है

जब लोसर की मस्ती में झूमने लगता है अरुणाचल 

अगर आप फ़रवरी के महीने में अरुणाचल प्रदेश जाएं और वहां के इलाकों आपको सड़कों के ऊपर लहराती हुई कपड़े की रंग-बिरंगी सैकड़ों पताकाएं दिखाई दें तो समझ लीजिएगा लोसर चल रहा है। लोसर दरअसल बौद्धों के नए साल पर मनाया जाने वाला त्यौहार है जो पूरे एक हफ़्ते से पंद्रह दिन तक चलता है। स्थानीय भाषा में ‘लो’ का मतलब होता है साल और ‘सर’ मतलब नया। फ़रवरी के दूसरे हफ़्ते में मनाए वाले इस त्यौहार की तैयारियाँ हर घर में पहले ही शुरू हो जाती हैं। लोग अपने-अपने घरों में साफ़-सफाई करते हैं, पुरानी चीज़ों को घर से हटाते हैं और घरों में मंत्र लिखे हुए कपड़े टाँगते हैं। माना जाता है कि इन कपड़ों में लिखे मंत्रों से बुरी शक्तियाँ दूर रहती हैं।
 
बोमडिला में लोसर की तैयारी
 
लोसर के दौरान बौद्ध मठों में तरह-तरह के कार्यक्रम की जाते हैं और धार्मिक पूजाओं का भी आयोजन होता है। लोग अपने पारम्परिक परिधानों को पहनते हैं और दिन-भर नाचते-गाते हैं। पहले यह त्यौहार केवल बौद्ध अनुयायियों के बीच लोकप्रिय था लेकिन अब स्थानीय हिन्दू जनजातियाँ भी इस त्यौहार को मनाने लगी हैं। लोसर के दौरान धार्मिक पूजाएं कराने वाले लामा लोगों को मारमे कहा जाता है। लोसर के कार्यक्रमों में स्थानीय परम्पराओं में शामिल लामसाम नृत्य और याक नृत्य का आयोजन भी किया जाता है। स्थानीय पेय छांगकोल इन दिनों आस-पास के हर घर में बनता है और जलसे के दौरान इसे सबको पिलाया जाता है। पहले बौद्ध मठों और अपने-अपने घरों तक सीमित रहने वाले इस आयोजन को अब सामुदायिक रूप से मनाने की परम्परा भी शुरू हो गई है। अरुणांचल प्रदेश के सामुदायिक जीवन और उत्सवधर्मी संस्कृति की एक बेहतरीन झलक देखनी हो तो लोसर उत्सव में शिरकत ज़रूर करनी चाहिए। 
 

इनरलाइन परमिट बनाना है ज़रूरी 

अरुणांचल प्रदेश की सीमा में प्रवेश करने के लिए इनरलाइन परमिट की ज़रूरत पड़ती है। ये एक तरह का सरकारी आज्ञा पत्र है जिसके बिना आपको इस प्रदेश की सीमा में जाने की अनुमति नहीं है। इनरलाइन परमिट दिल्ली, गुवाहाटी, शिलोंग, तेज़पुर में बने अरुणांचल भवन से बनवाया जा सकता है। परमिट बनवाने के लिए ऑनलाइन सुविधा भी मौजूद है। परमिट के लिए आपको वोटर आइडी कार्ड, पासपोर्ट, आधार कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस जैसे किसी परिचय पत्र की ज़रूरत होती है। रास्ते में बने चेकपोईंट्स पर इस परमिट की जांच के बाद ही आप आगे जा सकते हैं। अगर आप बोमडिला जाना चाहते हैं तो पहले ही परमिट बनाने की कार्रवाई पूरी कर लें तो बेहतर रहेगा।
 
 

कैसे पहुंचें 

बोमडिला पहुंचने के लिए गुवाहाटी तक प्लेन या ट्रेन से पहुँचा जा सकता है। दिल्ली, मुंबई या कोलकाता जैसे बड़े शहरों से गुवाहाटी के लिए फ़्लाइट और ट्रेन दोनों उपलब्ध हैं। गुवाहाटी से टेक्सी हायर की जा सकती है। वैसे यहां से सीधे बोमडिला के लिए बस भी चलती है। 
 
दूसरा तरीक़ा है कि आप सीधे तेज़पुर आ जाएं। तेज़पुर के लिए कोलकाता से फ़्लाइट ली जा सकती है। तेज़पुर से बोमडिला के लिए शेयर्ड टेक्सी भी मिलती है लेकिन आमतौर पर इसके लिए आपको पहले से काउंटर्स पर बुकिंग करनी होती है। तेज़पुर बाज़ार में बने काउंटर पर जाकर आप अपनी सीट एडवांस में बुक करा सकते हैं। तेज़पुर से बोमडिला की दूरी करीब 153 किलोमीटर है और पहुँचने में 5 से 6 घंटे का समय लग जाता है। रास्ते में ठहरकर आस-पास के नज़ारों का लुत्फ़ लेना हो तो प्राइवेट गाड़ी हायर करना बेहतर रहता है।
 

कब जाएं 

बोमडिला में अच्छी ख़ासी ठंड पड़ती है। सर्दियों में तापमान 5 डिग्री से नीचे भी चला जाता है। इसलिए अगर सर्दियों से बहुत ज़्यादा प्यार न हो तो ये वक़्त वहां जाने के लिए सही नहीं है। गरमियों का मौसम यानी अप्रैल से अक्टूबर का समय यहां आने के लिए एकदम मुफ़ीद है।वैसे भी दुनिया में बहुत कम चीज़ें ही हल्की सर्द हवाओं के बीच पहाड़ की गुनगुनी धूप से बेहतर होती हैं।
 

क्या ख़रीदें

बोमडिला तिब्बतन कारपेट के लिए जाना जाता है। इसके अलावा पारम्परिक मास्क, पेंटिंग्स और थांका भी यहां से ख़रीदे जा सकते हैं। इनपर किया जाने वाला बारीक काम और अलग-अलग थीम वाले रंग-बिरंगे डिज़ाइन इनकी ख़ासियत हैं। बोमडिला के क्राफ़्ट सेंटर और एथनोग्राफ़िक म्यूज़ियम से भी ये चीज़ें ख़रीदी का सकती हैं। खासकर ड्रैगन के चित्रों वाले कारपेट और पेंटिंग यहां पर्यटकों के बीच काफ़ी मशहूर हैं। ऊनी मफ़लर और टोपियाँ भी ख़रीदने के लिए अच्छा विकल्प हो सकती हैं। लोग अक्सर तोहफ़े और यादगारी के लिए बोमडिला से ये सामान लेना नहीं भूलते।
 

क्या खाएं 

बोमडिला तिब्बत की संस्कृति से प्रभावित है। इसलिए वहां का खान-पान भी उनके खान-पान से मेल खाता है। बोमडिला में रोड के किनारे ढाबों पर आपको गरम-गरम थुक्पा का स्वाद ज़रूर लेना चाहिए। थुक्पा एक तिब्बती डिश है जो सूप में नूडल्स डालकर बनाई जाती है। इसके अलावा यहां के मोमोज़ भी आपको ज़रूर ट्राई करने चाहिए। 
 
थुक्पा और मोमोज़ जैसी लोकप्रिय खाने की चीज़ों के अलावा स्थानीय मोंपा समुदाय का अपना पारम्परिक खान-पान भी है। जिसे मौका मिलने पर आपको ज़रूर आज़माना चाहिए। 
   
तवांग की मशहूर मोनेस्ट्री
 

हिमालय के विस्तार में संस्कृतियों का अद्भुत संगम 

गुवाहाटी के हिंदी अख़बार पूर्वोदय टाइम्स के संपादक, रविशंकर रवि ने पूर्वोत्तर की यात्राओं पर आधारित एक किताब लिखी है- लाल नदी, नीले पहाड़. उन्होंने बोमडिला शहर और लोसर उत्सव के बारे में कुछ खास जानकारियां मुझे दी. उन जानकारियों का लब्बोलुबाब ये रहा.
 
सूर्य की किरणों से चमकती बर्फीली चोटियों से आती नम हवा और हिमालय के विस्तार को शांत वातावरण में महसूस करने वालों के लिए अरुणाचल प्रदेश का बोमडिला शहर उत्तम स्थल है। शहरी प्रदूषण और ट्रैफिक के शोर-शराबे से दूर यह शहर जितना दर्शनीय है उतना ही अद्भुत है यहां की संस्कृतियों का संगम। पूरे परिवेश पर बौद्ध धर्म का महात्मय मन को अध्यात्मिकता की ओर ले जाता है और जीवन वायु प्रदान करता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह हिमालय की गोद में बसा हुआ शहर है। चारों तरफ दूर तक प्राकृतिक सुंदरता फैली हुई है। 
 
किसी जमाने में बोमडिला दर्रे से रास्ता सीधा तिब्बत के ल्हासा तक जाता है। चीन का तिब्बत पर कब्जे के बाद काफी संख्या में बौद्ध भागकर यहां बस गए, लेकिन बौद्ध इसके पहले भी इस क्षेत्र में आते रहे हैं। इसलिए बोमडिला पर बौद्ध संस्कृति का व्यापक प्रभाव देखा जा सकता है। बौद्ध धार्मिक गीतों के संकलन और उसे नया रूप देने में जुटे ग्राहम लामा बताते हैं कि भौगोलिक सीमा भले ही हिमालय को बांटती हों, लेकिन हमारे लिए हिमालय एक ही है। सीमा के इस पार हो या उस पार। परिवेश बिलकुल समान है। इसलिए हमारे पूर्वजों को इधर आकर बसने में कोई परेशानी नहीं हुई। 
 
अरुणाचल में बौद्ध धर्म के अनुयायी नए वर्ष का उत्सव- लोसर मनाते हैं। आमतौर से यह उत्सव बौद्ध धर्म के अनुयायी-लामा लोग मनाते हैं, लेकिन इसके साथ ही बौद्ध धर्म के प्रभाव में आ चुकी दूसरी जनजातियां-मसलन शेरडुकपेन आदि भी मनाती है। इसलिए तवांग से भालुकपोंग (असम की सीमा) तक आमतौर पर फरवरी के दूसरे सप्ताह में हवा में लहराती बौद्ध पताके और पवित्र मंत्र लिखे कपड़े की पट्टियां पूरी घाटी में देखी जा सकती है। जिस देखते ही यह बात किसी को भी समझ में आ जाती है कि बौद्धों की नया साल-लोसर आ चुका है।
 
तवांग में बुद्ध की विशाल प्रतिमा
 
इस मौके पर प्रत्येक बौद्ध मठ को सजाया जाता है और पूजा के विशेष अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।  जहां पर दैनिक पूर्जा-अर्चना संपन्न की जाती है। ये पवित्र स्थान के कमरे काफी विशाल होते हैं, जिनमें अवलोकी ईश्‍वर की वृहत आकृतियां होती है। 
 
बौद्धत्व के अध्ययन शास्त्र का पहलू काफी विशाल है और इसका प्रत्येक अंग बौद्ध धर्म से जुड़े इतिहास से मेल खाता है। बौद्धत्व की कुल आठ प्रधान चेष्टाएं हैं- कलश, चक्र, यंत्र, छत्र, विजय ध्वज, मतस्य और कमल। बौद्ध कला अपनी पारदर्शिता और अनुशासन की वजह से आज एक उच्च शिखर पर पहुंच गयी है। इस बहाने बौद्ध धर्म और परंपरा के बारे में बहुत कुछ जाना जा सकता है। 
 
 
लोसर उत्सव के दौरान नृत्य- अजिलामु  या लामसाम नृत्य, याक नृत्य या याक सबा प्रस्तुत किए जाते हैं। इका भी आनंद लिया जा सकता है। उनमें विभिन्न पशु-पक्षी आदि के लिए मुखौटे का उपयोग होता है। इन नृत्यों की प्रस्तुतियों के पीछे ईश्‍वर को प्रसन्न करने तथा उनकी पारंपरिक पूजा के प्रति सम्मान व्यक्त करने की अवधारणा होती है।
 
बोमडिला पहाड़ी के नजदीक में बसा है वामहुक गांव। यहीं पे रहते हैं भुगुन समूह के लोग। कोई भी संस्कृति और उसकी कला वसीयत वस्तुओं की परवरिश का उत्तरदायित्व मुख्यत: समाज या समुदाय की नारी जाति के हाथ में थमा हुआ होता है। भुगुन महिलाएं पुरुषों की तरह काफी मेहनती हैं। अपने रोजमर्रा की कामों को निपटाकर वह विश्राम के समय नाच-गाने और पारंपरिक कार्य जुट जाती हैं। भुगुन समुदाय वाले अपनी संस्कृति को लेकर काफी जागरुक हैं। उनकी कला और शिल्प संबंधी दिलचस्पी गजब की है।

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Written by 

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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