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पहाड़ी जायके के बहाने

मम्मी ने रात को भट के दाने भिगा दिये । सुबह सुबह मैं जब इन दानों को देखता हूं तो इनमें एक अजीब सी विशालता आ जाती है। रात को ये दाने इतने बड़े कहां थे। मुझे हैरानी होती है। कहीं संबह सुबह की धूप के घुलने से तो ये दाने फूल नहीं गये होंगे। मैं इस समय विज्ञान भूल जाना चाहता हूं। मम्मी ने जब इन्हें भिगाया होगा तो क्या उसे भी विज्ञान याद रहा होगा। नहीं ना। फिर क्यों मैं इन दानों के फूल जाने में किसी किसम का ज्ञान चेप लूं। मुझे ये दाने अभी किसी मोती के दानों से कम नहीं लग रहे। बांई ओर की खिड़की से बड़ी ताजी सी रोशनी की कई किरणें इन दानों पर पड़ती बिखरी जा रही हैं। और ये दाने निखर जाने की हद तक खूबसूरत दिखने लगे हैं मुझे। मैं एक तस्वीर खींचता हूं। मन नहीं भरता। और भी कई तस्वीरें खींच लेता हूं। ताकि ये दाने जिस भी वजह से भिगाये हों उस वजह के आने से पहले कुछ ऐसा हो जाये कि इनकी इस खूबसूरती को सहेजा जा सके। और फिर जब उस तस्वीर को देखा जाये तो ये अजीब से पागल पागल से क्षण इन दानों की शक्ल में याद आ जायें। एक बार फिर।

मम्मी ने इन दानों का क्या किया। वो इन्हें मिक्सी में पीस रही है। मिक्सर ग्राईन्डर को यही तो कहते हैं हमारे पहाड़ में बड़े प्यार से। पहले ये दाने सिल बट्टे में पीसे जाते थे। बड़ी मेहनत से। इन दानों का आज भटिया बनने जा रहा है भटिया। नाम बड़ा अटपटा सा जरुर है पर कुमांउं में इस डिस का बड़ा क्रेज है बाईगौड। किसी भी कुंमाउंनी से पूछियेगा कि भटिया खाया है कभी। तो आपकी ओर हैरानी से देखेगा। भटिया ना खाया हो ऐसा हो कैसे सकता है। और अगर कोई कुमाउनी ये कहे कि उसने भटिया कभी नहीं खाया तो उसके कुमाउनी होने पर आप मेरी तरफ से शक कर लीजियेगा। यहां तो हफ्ते में एक बार भटिया हर घर में बनता ही है। मिर्च और नमक को धनिये के साथ पीसकर बने नमक के साथ भटिया खाने का अपना मजा है। साथ में झोली और पालक की सब्जी हो और भांग की चटनी परोस दी जाये तो मजा आ ही जाता है। खैर मम्मी ने जो भट पीसे थे उनका आज मेरे घर में भी भटिया ही बना है।

वैसे भट के इन दानों से एक और पहाड़ी डिस बनती है। भट की चुड़कानी। चुड़कानी माने होता है बिल्कुल गर्म। भट की चुड़कानी को गर्म गर्म ही परोसा जाता है। लेकिन इसको बनाने के लिये भटिये की तरह भट भिगाये नहीं जाते। बल्कि उन्हें भूना जाता है और फिर प्याज और आटे के साथ इन भूने हुए दानों को एक बार फिर भूनकर बनाई जाती है भट की चुड़कानी।

ठंड के मौसम की गुनगुनी धूप और माल्टा और नारंगी। माल्टा माने मुसम्मी और नारंगी माने संतरा। लेकिन दिल्ली में इन्हें आराम से बैठकर खाने की न फुरसत होती है न उसका वो मजा ही होता है। छत पर आराम से बैठा जाये और माल्टा या नारंगी को छीला जाये और अलग अलग फेसे निकालकर पूरा समय लेकर उसे खाया जाये। फुरसत के पलों में मीठा मीठा सा ये खट्टा स्वाद बड़ा लजीज जान पड़ता है इस गुनगुनी धूप में बैठे हुए।

माल्टा के साथ अगर चूख बड़ा नीबू, हो तो इसे दूसरी तरह से खाने का मजा भी लिया जा सकता है। हम पहाड़ी भाषा में इसे चूख सानना कहते हैं। चूख, माल्टा और नारंगी को छीलकर उसके फेसे निकाल लिये जायें और फिर उन फेसों के भी छोटे छोटे टुकड़े कर लिये जांयें। और फिर इसमें मिलाया जाये मिर्च, नमक और धनिये के साथ पिसा हुआ नमक और चीनी। और हाथ से अच्छी तरह मिलाकर चटख धूप में इसे खाया जाये। फिर देखिये। सेंटर शौक खाकर जो मीठा मीठा सा खटटा शौक लगता है वो इसके सामने कुछ नहीं होगा। इस सनेपन में आपका चेहरा एक एक्सरसाईज सी करते हुए किसी गजब के स्वाद से भर जायेगा। स्वाद लें तो बतायें कैसा लगा।
बड़ी की सब्जी भी पहाड़ी लोगों की एक चहेती डिस है। वो रामलीलाओं से कुछ दिन बाद का समय होता है जब घरों में एक काम बड़े स्तर पर किया जा रहा होता है। अब तक पीली पड़ चुकी ककड़ियों को कद्दू कस में कोरने का काम। इन ककड़ियों को कोरने के बाद मास को पीसा जाता है और इसमें कोरी हुई ककडियों को मिलाकर बनाई जाती है छोटी छोटी बड़ियां। छोटी-बड़ी। वाह। और फिर ये छोटी बड़ियां सुखाई जाती हैं धूप में। फिर डब्बों में भर भर कर इन्हें साल भर तक सब्जी बनाने के काम में लाया जाता है।

सिंगल भी एक ठेठ पहाड़ी पकवान है। त्यौहारों के मौकों में पकवान तो हमारे देष के हर हिस्से में बनते ही हैं। सिंगल भी एक ऐसा ही पहाड़ी पकवान ठहरा। सिंगल को बनाने का तरीका कुछ कुछ जलेबी बनाने के तरीके से मिलता है। लेकिन होता ये जलेबी से बिल्कुल अलग है। सूजी या चांवल के आटे को दही के साथ घोलकर इसमें चीनी मिला ली जाती है। और इस घोल को जलेबी के स्टाइल में हाथों से घुमाकर तेल या घी में भून लिया जाता है। लेकिन सिंगल बनाने के लिये खास तरह की टैक्नीक चाहिये। वरना इसका हलवा बनते देर नहीं लगती। मेरी मम्मी जो चटनी बनाने में एक्सपर्ट है सिंगल उतने अच्छे नहीं बना पाती। कोई जाके बता न दे कि उनका बेटा यहां ब्लाग पर उन्हें चेलेंज कर रहा है।
मौणिया चांवल के आटे से बनाया जाता है। सूखा हलवा टाईप कुछ। कई लोग इसे साया भी कहते हैं। मौड़िये में भी दही का इस्तेमाल किया जाता है। हम लोग अक्सर शाम के नास्ते में चाय के साथ इसे खाया करते थे। थे इसीलिये कि यहां शाम के नास्ते जैसी चीज के लिये फुरसत कम ही मिल पाती है। कैन्टीन से कुछ खा लो वही बहुत है।
जौला को आप पथ्य कह सकते हैं। यानी बीमारों को दिया जाने वाला खाना। पर मुझे जौला बड़ा पसंद है। चांवल और मट्ठे को मिलाकर बनता है जौला। कुछ कुछ खिचड़ी जैसा। पर इसमें बांकी किसी तरह की दाल वाल नहीं मिलाई जाती। बस घी में जीरे या धनिये का छौंक लगा दिया जाता है और चांवल में और मट्ठा मिलाकर हल्के से मसाले के साथ दो तीन सीटी लगाकर कूकर में पका दिया जाता है। और जौला तैयार।

पिनालू के गुटके दरअसल पिनालू यानी अरबी को उबालकर उसके छोटे छोटे टुकड़े बनाकर उसे तेल में छौंककर बनाये जाते हैं। अपने स्वाद से नमक मिर्च मसाला डाला जा सकता है। लेकिन अगर छौंकने मन न हो तो गरम गरम पिनालू बस धनिये में पिसे हुए नमक के साथ भी खाये जा सकते हैं। साथ में चाय हो तो और ही बात है।

डुबका चने की दाल से बनता है। काले चने को रात में भिगाकर सुबह उन्हें पीस लिया जाता है। और प्याज टमाटर के साथ छौंककर उसमें पानी मिलाकर बन जाता है डुबका।

ये कुछ ऐसे पहाड़ी स्वाद हैं जिनका स्वाद उनके साथ जुड़े हुए अपनेपन से ज्यादा बढ़ जाता है। साउथइन्डियन या पंजाबी खाना तो मैट्रो सिटीज में भी फेमस है पर हमारे देश के हर इलाके के कई ऐसे पकवान या व्यंजन हैं जिनका अस्तित्व बस उन्हीं इलाकों तक सिमटा हुआ है। और उनमें स्थानीयता का एक गहरा भाव जुड़ा हुआ है। सम्भव है इनका स्वाद अपनी स्थानीयता में ही हो। लेकिन कई बार इस तरह के व्यंजन कई तरह के प्रभावों की वजह से प्रचलन से बाहर चले जाते हैं। मसलन फास्टफूड का कल्चर गांवों में भी अपनी दखल बना चुका है। जैसे मैगी, चाउमीन, मोमो जैसी चीजें गांव घरों तक जा पहुंची हैं जिसमें गलत जैसा कुछ नहीं है। लेकिन इन खाद्य पदार्थों ने स्थानीय व्यंजनों के लिये लोगों के खासकर मेरी पीढ़ी के लोगों के रुझान को कम किया है। हम जैसे लोग जो घर से बाहर रह रहे हैं वो घर जाते हैं तो उनमें इस तरह के स्थानीय खाने का क्रेज रहता है। क्योंकि यहां दिल्ली में तो ये खाना मिल नहीं पाता। लेकिन गांवों या कस्बों में ये पकवान बनने बंद होने लगें तो ये चिन्ता की बात हो सकती है। खैर यहां ब्लौग में इनका जिक्र करने का मकसद बस यही है कि अगली बार पहाड़ी खाना खाने का मन हो तो आपके पास कुछ नाम हों कि चलो आज भटिया खाने का जुगाड़ कर लिया जाये।

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उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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One Comment

  1. लालच दिलवा दिलवा कर मार डाला….एक से एक पकवान और खाने के लजीज तरीके..गज़ब की पोस्ट…आभार!!

  2. Thank you for a great article – straight from the heart (to the stomach). But you are absolutely correct. For some of us who live outside the country, even a “cutting” chai is like an elaborate dish that we pine for.

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